मंगलवार

बेहद सुकून देनें बाली वह मेरी किशोरावस्था !!!!

at 04:44
मनोज जैसवाल  ::  बेहद सुकून देनें बाली वह मेरी किशोरावस्था थी। उन दिनों हम  पीलीभीत  में रहते थे। मेरे पिता के पास एक  स्कूटर हुआ करता था। उस पर पीछे बैठकर हरी-भरी सड़कों पर घूमना शानदार अनुभव होता था। तब शहरों में ऐसी जानलेवा भीड़ नहीं होती थी और बहुत कम लोगों को स्कूटर या कार नसीब थी। अधिकांश लोग साइकिलों पर निर्भर थे और सुबह के समय कोर्ट या  ऑफिस के पास साइकिलों की भीड़ नजर आया करती थी। जाहिर है कि स्कूटर रखना ऐसे समय में शान की बात थी और उसमें पेट्रोल भरवाना गर्व भरे आह्लाद का विषय। मालूम नहीं था कि इस आह्लाद में आग लगने वाली है।हमारे घर के पास  चौराहे से सटा हुआ इंडियन ऑयल का पेट्रोल पंप था, जो आज भी वहीं है। एक दिन सुबह पापा के साथ पेट्रोल भरवाने गया, तो छककर टंकी भरवाने के अभ्यस्त पिता ने सिर्फ दो लीटर पेट्रोल भरवाया। पंपवाले ने अजीब-सी मुस्कान के साथ टिप्पणी की थी कि अब तो तेल इतना महंगा हो गया है कि लोगों का खून भले ही जल जाए, पर वे पेट्रोल‘’ फूंकना पसंद नहीं करेंगे। 

राजकीय इंटर कॉलेज की सातवीं या आठवीं में पढ़नेवाले बच्चे को मालूम नहीं था कि अरब देशों का समूह यकायक अपनी जमीन और समुंदर के नीचे छिपी इस संपदा को लेकर संवेदनशील हो गया है। अब ताउम्र उसे और समूची दुनिया को इन उत्पादों की आपाधापी को झेलना होगा। बाद में 1982 में जब अपना स्कूटर खरीदा, तब भी पेट्रोल महंगा नजर आता था और बहुत सारा काम मैं साइकिल से ही निपटा लिया करता था।  हर रोज ऑफिस आने-जाने में ही 50 से 60 किलोमीटर कार चलानी होती है। तीन-चार दशकों का अनुभव यह कहता है कि हमें महंगे सफर की आदत डाल लेनी चाहिए।
पेट्रो-उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण सरकारों के वश में नहीं है। इसके लिए राजनीतिज्ञों में दृढ़ इच्छाशक्ति और आम आदमी में अपना रास्ता स्वयं चुनने की क्षमता का विकास बेहद जरूरी है। पहले राजनेताओं की बात। यह बहस बहुत पुरानी पड़ गई कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से हम तक पहुंचने में पेट्रो पदार्थों की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी हो जाती है। केंद्र सरकार के अपने तर्क हैं। राज्य जवाबी कुतर्क ढूंढ़ लेते हैं और हम हमेशा की तरह इस मुद्दे पर खुद को बिसात पर बिछा हुआ एक अदना-सा मोहरा ही महसूस करते हैं। मैं यहां गोवा की सरकार की प्रशंसा करना चाहूंगा। उसने पेट्रोल से टैक्स कम किया और शराब पर कर बढ़ा दिया। अन्य राज्य सरकारें ऐसा क्यों नहीं सोचतीं? शराब जरूरी है या पेट्रोल? जवाब मुश्किल नहीं है, पर हमारे राजनेताओं को साधारण बातें जरा देर से समझ में आती हैं।
यही नहीं, पेट्रो-पदार्थों के खर्च पर अंकुश लगाने के लिए हमें साझी नीतियों की जरूरत होगी। नौकरशाहों और नेताओं के परिजन किस हक से सरकारी गाड़ियों में घूमते हैं? अभी भी इसकी रोकथाम के लिए कुछ नियम हैं, पर इनकी हमेशा अनदेखी होती है। क्यों नहीं इन नियमों को सख्त किया जाए और उनके अनुपालन में कड़ाई बरती जाए? कई ऐसे पद हैं, जिन पर बैठे लोगों के आवासों पर तमाम सरकारी गाड़ियां खड़ी दिखती हैं, क्या ‘एक व्यक्ति, एक वाहन’ का सिद्धांत नहीं लागू किया जा सकता? नौकरशाहों और नेताओं को अपने घर से कार्यालय आने-जाने के लिए गाड़ी क्यों मुहैया करवाई जाती है? क्यों न इस पर पाबंदी लगा दी जाए? जो लोग इन कायदों को तोड़ें, उनके नाम सार्वजनिक किए जाएं और उन्हें ‘फास्ट ट्रैक’ अदालतों के हवाले कर दिया जाए।यह भी वक्त की बड़ी जरूरत है कि ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण को राजनीतिक पार्टियां अपने एजेंडे में शामिल करें। बहुत से मुख्यमंत्री अपना रिपोर्ट-कार्ड जारी करते हैं, अच्छा होगा वे अपने घोषणा-पत्रों में इनका भी जिक्र करें और इससे जुड़ा हुआ डाटा देश की जनता को उपलब्ध करवाया जाए। इस तरह की सूचनाओं को विधानमंडलों के पटल पर भी रखा जाए, ताकि उन पर खुली बहस हो सके। हमारे राजनेताओं को भी इससे उबाऊ और तथ्यहीन तर्क-वितर्क से मुक्ति मिल सकेगी। उनका कहा-बोला तब आम आदमी का हित साध सकेगा।इस मामले में हम कुछ छोटे देशों से सबक ले सकते हैं। ब्राजील संसार की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। वहां पर कुछ नियम बनाए गए हैं। मसलन, गाड़ियों के आखिरी नंबर के आधार पर यह तय किया गया है कि सप्ताह में एक दिन उस अंक की गाड़ी सुबह 7-10 और शाम को 5-8 बजे के बीच में सड़क पर नहीं उतर सकती। फिलीपींस में यह नियम सुबह 7 से शाम 7 बजे तक लागू होता है। इस तरह हफ्ते में एक दिन हर वाहन को 12 घंटे तक उपयोग से अलग कर दिया जाता है। स्कूल बसों, एम्बुलेंस, फायरब्रिगेड और सुरक्षाबलों की गाड़ियों को इस नियम से राहत है। इन नियमों से ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण का बेहद भला हुआ है।
हम जापान से भी सबक ले सकते हैं। 27 फीसदी लोग वहां पर प्रतिदिन रेलवे की सेवा लेते हैं। ग्रेट टोकियो जैसे बेहद व्यावसायिक क्षेत्रों में तो यह संख्या 50 फीसदी से अधिक हो जाती है। आपको याद होगा। फुकुशिमा में जब परमाणु रिएक्टर में रिसाव हुआ था और जापान भूकंप की विपत्ति से थर्राने लगा था, तो टोकियो में बहुत से लोग कई दिन इसी वजह से घर नहीं पहुंचे थे। वजह? ट्रेनों के पहिए थम गए थे। उन्होंने सरकार से गिला-शिकवा नहीं किया, क्योंकि वे खुद को सरकार मानते हैं और स्वयं अपनी जिम्मेदारी तय करते हैं। हम हिन्दुस्तानी कब एक परिपक्व लोकतांत्रिक नागरिक की तरह व्यवहार करना सीखेंगे?देश के महानगरों में अब ‘कार पूल’ का फैशन जोर पकड़ रहा है, पर अभी इसे विकसित यूरोपीय देशों के बराबर पहुंचने में काफी वक्त लगेगा। यही नहीं, हम हफ्ते में एक दिन अपने ऊपर यह पाबंदी लगा सकते हैं कि वाहन की चाबी को अपनी जगह पर टंगा ही रहने दें। मैं मेरठ और आगरा में सप्ताह में एक दिन खुद को कार के इस्तेमाल से वंचित रखता था। यहाँ  यह कम ही संभव हो पाता है, पर फिर भी कोशिश करता हूं कि महीने में चार दिन अपनी गाड़ी का प्रयोग न करूं। इस सप्ताह से इसे हर हाल में निजी नियम के तौर पर अपनाऊंगा। मेट्रो ने दिल्ली और एनसीआर वालों को यह सहूलियत तो प्रदान कर ही दी है।यहीं एक सवाल उठता है कि हमारी सार्वजनिक यातायात व्यवस्था कैसी है? कुछ महानगरों को छोड़ दें, तो उन्हें भ्रष्टाचार का घुन खा गया है। गुड़गांव जैसे महंगे शहर में अपनी निजी ट्रांसपोर्ट व्यवस्था नहीं है, छोटे शहरों की तो बात ही छोड़ दीजिए। हमें अपनी पहुंच के जनप्रतिनिधियों पर इसके लिए दबाव बनाना होगा, ताकि सरकारें सचेत हो सकें और हम महंगे पेट्रो पदार्थों की मार से खुद को कुछ हल्का रख सकें।

  manojjaiswalpbt


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7 टिप्‍पणियां

  1. हमें अपनी पहुंच के जनप्रतिनिधियों पर इसके लिए दबाव बनाना होगा,

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  2. विचारणीय आलेख....

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  3. जन प्रतिनिधी जीतने के बाद कहाँ किसी की सुनते हैं।

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  4. पोस्ट पर टिप्पणी के लिए आप सभी का दिल से आभार

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  5. जबरदस्त

    www.mmmindia12.blogspot.com

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