सोमवार

उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का सच !!!

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मनोज जैसवाल : मायावतीजी की काबीना ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पास करवा ही लिया। और अब राजनीति के मैदान में सिर से सिर जोड़े गुणी ओझा की तरह तमाम दलों के विशेषज्ञ इसके फलार्थ और निदान टटोल रहे हैं। मायावतीजी एक तपी हुई राजनेता हैं, जो जातीय युद्ध की आग में घुसकर बहुजन समाज की नींव पुख्ता करने के बाद अब लगातार अपने राष्ट्रीय नेतृत्व की पीठिका तैयार कर रही हैं।

एकाधिक बार समाजवादियों द्वारा राजनीतिक वनवास को भेजी जाने के बाद भी न उनकी आक्रामक ऊर्जा घटी है, और न ही उनका दलित जनाधार। उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर बार वह जब मुख्यमंत्री बनकर अवतरित हुईं, उन्होंने नए जातीय समीकरण गढ़ने के कई चौंकानेवाले प्रयोग सफलता से किए। इधर उनकी रुचि नई तरह के स्थापत्य में बढ़ी है।

मायावतीजी  2007 में पदभार संभालने के साथ ही कह चुकी हैं कि 20 करोड़ की आबादी वाले देश के इस सबसे बड़े सूबे का शासन एक ही जगह से चलाना नामुमकिन है। अंबेडकर ने भी 1955 में अपनी किताब (थॉट्स ऑन लिंगुइस्टिक इंडिया) में लिख दिया था कि सुचारु राज-काज चलाने और दक्षिणी राज्यों पर हिंदी पट्टी की राजनीति हावी होने से रोकने को बिहार, मध्य प्रदेश के दो-दो और उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े कर देने चाहिए।

वर्ष 2000 तक इनमें से दो राज्यों की तो बंटवार हो चुकी है, फिर भी उपरोक्त थीसिस के अनुसार नई बंटवार की गुंजाइश है। लिहाजा इसके सांस्कृतिक और भाषाई आधारों पर इसे पश्चिमी प्रदेश, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल  में बांटने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया है।

अब तक मंदबुद्धि जन भी मानने लगे हैं कि संविधान के अनुसार देश एक है, कहते रहने से भारत खुद को एक नहीं मान सकता। राज्यों के भाषा, अस्मिता, समान विकास आदि के आधार पर बंटवार की मांग यहां लगातार जोर मारती है। और इसीलिए पोत्ति रामालु से लेकर मास्टर तारासिंह तक कई जुनूनी शहीदों ने 1947 के बाद एक के बाद एक केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक तथा पूर्वोत्तर की सात बहिनों से लेकर हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड सरीखे छोटे राज्यों को बड़े राज्यों को काटकर यों बनवाया, जैसे कभी ईश्वर ने (बाइबिल के अनुसार) आदम की पसली निकालकर उससे हव्वा को गढ़ा था।

पर यह रोचक है कि उत्तर प्रदेश में इस मांग का स्रोत राज्य के कुछ खास हिस्सों के अधिक प्रगतिशील या दुर्गति को प्राप्त इलाकों के बीच नहीं है, बल्कि कांग्रेस, भाजपा के विपरीत बसपा की लगातार ताकतवर होती निर्विवाद सुप्रीमो अब अपने महत्व के अनुपात में दिल्ली की सत्ता में अपना वाजिब पद चाहती हैं। फिर भी आज की तारीख में दिल्ली के तख्त की राह बड़े राष्ट्रीय दलों की धैंया छूकर ही जाती है। वजह यह कि ऊपर उठते शहरी मध्यवर्ग, अल्पसंख्यक और ग्रामीण गुटों के ताकतवर नेताओं को अब भी उत्कट जातिवादी और तानाशाही की हद तक एकलखोरे क्षेत्रीय सुप्रीमोज के बजाय, जो उनको एकता में अनेकता और सर्वानुमति के गड़बड़झाले के बीच राष्ट्रीय स्तर पर अनेक लाभकारी मध्यमार्गी पैकेज बांटने को दें, ऐसे बड़े दलों को ही दिल्ली सौंपना अधिक निरापद प्रतीत होता है।

सूबों में जाकर बड़े राष्ट्रीय दल क्षेत्रीयतावादी नारे भले बुलंद करें, दिल्ली के मामले में सब गड़बड़ झालावादी हैं। 2014 के चुनावों के बाद दिल्ली की सत्ता में बैठने को इच्छुक सिमटते जनाधार वाले हर राष्ट्रीय दल के लिए प्रांतीय दलों से कुछ न कुछ वोट उधारी लेनी होगी। और प्रांतीय दल भी जानते हैं कि राष्ट्रीय स्वीकार्यता के लिए दिल्ली में बड़े दलों की प्रतीकात्मक राष्ट्रीय छतरी की कितनी जरूरत है। ऐसे में दोनों के बीच मौसेरे भाइयों का रिश्ता बना रहना सहज है।

प्रस्ताव से हतप्रभ दलों के लिए कांटे का सवाल यह नहीं कि वे इसे माया का धोबीपाट दांव मानें या महज एक शोशा? असल सवाल अब यह है कि खुद मायावतीजी  जब चार हिस्सों में बंटे उत्तर प्रदेश से अलग होकर दिल्ली चली गईं, तो क्या गारंटी है कि नए राज्यों के मतदाता बसपा के लगभग व्यक्तित्व शून्य रखे गए मनसबदारों को शासन सौंप देंगे? माना कि बसपा को बहुमत मिल भी गया, तो अपने विश्वस्त का राजतिलक करवा कर जहां बहिन जी दिल्ली लौटीं, उनके पीछे कोई महत्वाकांक्षी और क्षुब्ध रहा कुशवाहा, या कोई और बसपा का हश्र भी लालूजी  की जबरन एकचालकानुवर्ती रखी गई राजद सरीखा तो न कर देगा? लालू की अर्धांगिनी की असंदिग्ध स्वामिभक्ति उनके दिल्ली प्रवास के दौरान उनकी खड़ाऊं ससम्मान रखे रही। पर एकाकी और अंतर्मुखी मायाजी  किस पर और कैसे भरोसा कर पाएंगी कि वह पार्टी को हाइजैक करने का मनसूबा नहीं पाल बैठेगा?

एक शंका और है। दलों को अखिल भारतीय जनाधार बनाने और उसे संतुलित रखने की क्षमता देने वाला और विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और बोलियों की गंगा-जमुनी धरती रहा उत्तर प्रदेश अगर क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर बांटा गया, तब बसपा तो शायद ही राष्ट्रीय दल बने, पर जुझारू क्षेत्रवाद और सांप्रदायिकता हर जगह बढ़ेगी। तब शायद पश्चिमी प्रदेश में जाट बनाम जाटव धड़ेबाजी ज्यादा तल्खी से उभरेगी और देवबंद सरीखी संस्थाएं मुसलमान बहुल इलाके में कोटा आरक्षण मांगेंगी।

पूर्वांचल और बुंदेलखंड में भी पुरानी दलित बनाम सवर्ण या बुंदेलखंड बनाम बघेलखंड सरीखी टकराहटें नए रूप में सतह पर उभरेंगी। फिर इन इलाकों में आपराधिक गुटों के चुनावी राजनीति में पैठ का लंबा पुराना इतिहास तो है ही। यह भी असंभव नहीं कि वहां आज की बसपा या सपा के ही दो गुटों के बीच चुनावी स्पर्द्धा होने लगे और जिस धड़े को बहुमत न मिले, वे कांग्रेस या भाजपा से हाथ मिलाने की सोचें। ऐसे माहौल में असलहों और बाहुबलियों की अंतर्प्रांतीय आवाजाही तो अनिर्बाध जारी रहेगी ही।

क्या यह संभव नहीं कि अविभाजित उत्तर प्रदेश की जो बुराइयां गिनाई जा रही हैं, वे देश के लिए बड़े शक्तिस्रोत साबित हों? एक कथित बुराई यह है कि यह प्रदेश एक सांस्कृतिक खिचड़ी है, जिसमें प्रांतीयता, जातिवाद, गुटबाजी के भरपूर तत्व हैं। पर वे किस राज्य में नहीं हैं? उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके मैदानी लोगों के बढ़ते वर्चस्व से तिलमिला रहे हैं। अगर हम आज के उत्तर प्रदेश की एकता तले अनेकता को भारतीय लोकतंत्र का गुणसूत्र मानकर स्वीकार कर लें, तो पाएंगे कि यह विचारधाराओं का कैसा रंगारंग बिग बाजार है।

यह जीवंत विविधता गई, तो यह इलाका भी चार सामान्य प्रदेशों का गुलदस्ता बन जाएगा और संयुक्त कुटुंब के अपनत्व भरे गड़बड़झाले के आदी लोग तब उत्तराखंड के कई लोगों की तरह खोया-खोया महसूस करेंगे।

 manojjaiswalpbt
 

13 टिप्‍पणियां

  1. यह केबल ड्रामेबाजी ही है.

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  2. शानदार पोस्ट मनोज जी धन्यबाद.

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  3. पोस्ट पर राय के लिए आप सब का आभार.

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  4. अच्छा आलेख धन्यबाद मनोज जी.

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  5. एक कड़ुआ सच सुन्दर लेख के लिए आभार.

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  6. पोस्ट पर राय के आप का दिल से आभार।

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  7. बेहद शानदार मनोज जी

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