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गुरुवार

'बॉडीगार्ड' (ऑनलाइन देखे ) के सामने ठंडी साबित हुई यह 'ब्रदर की दुल्हन'!

at 01:35
View Image in New Windowमनोज जैसवाल : इमरान खान और कैटरीना कैफ अभिनीत रोमांटिक कॉमेडी फिल्म 'मेरे ब्रदर की दुल्हन' का फिल्म 'बॉडीगार्ड' की तरह धमाकेदार ओपनिंग तो नहीं हुई लेकिन इस फिल्म ने सप्ताहांत में 25.6 करोड़ रुपये की कमाई कर ली है।



यह फिल्म 30 करोड़ के कुल लागत के साथ तैयार हुई जिसमें प्रोडक्शन, प्रिंट पब्लिसिटी और मार्केटिंग शामिल है। यशराज बैनर की इस फिल्म के लिए सिनेमाघरों में करीब 80 से 90 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज की गई।



पीवीआर के एक सूत्र ने बताया, "फिल्म 'मेरे ब्रदर की दुल्हन' की अच्छी शुरुआत हुई। सिनेमाघरों की सीटें करीब 90 प्रतिशत भरी रहीं क्योंकि इस फिल्म का विषयवस्तु नवयुवकों को खासा भा रहा है। सोमवार को भी काफी भीड़ दर्ज की गई।"



नवोदित निर्देशक अली अब्बास जफर ने इस फिल्म का निदेशन किया है। यह फिल्म एक शहरी मध्यम वर्गीय परिवार पर आधारित है। फिल्म की कहानी लव अग्निहोत्री (अली जफर) और कुश अग्निहोत्री (इमरान खान) के इर्द-गिर्द घूमती है।



वेब्स सिनेमा के योगेश रैजादा ने कहा, "फिल्म के बारे में लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया है। इमरान, कैटरीना और अली जैसे सभी कलाकारों ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। यह एक पारिवारिक फिल्म है जिसमें भावना, नाटक और हास्य का मिश्रण है। कुल मिलाकर यह अच्छी फिल्म है।"



शाहिद कपूर और सोनम कपूर अभिनीत फिल्म 'मौसम' के उसी दिन प्रदर्शित किए जाने पर इसके प्रभावित होने की सम्भावना व्यक्त की गई थी। 

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Starring - Salman Khan, Kareena Kapoor, Mahesh Manjrekar, Shatrughan Sinha, Aditya Pancholi, Hazel Keech, Rajat Rawail, Asrani, Katrina Kaif

Director - Siddique

Genre - Action, Comedy, Romance

Movie Info -

Movie Description - Not Available
Bodyguard 2011 Hindi Movie Watch Online

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शनिवार

डेल्ही बेली :यह फिल्म आप यहाँ देख सकते है

at 18:49
मनोज जैसवाल
फिल्म: डेल्ही बेली
कलाकार: इमरान खान, पूर्णा जगन्नाथन, वीर दास, कुणाल रॉय कपूर
निर्देशक: अभिनय देव
निर्माता: आमिर खान, रोनी स्क्रूवाला, किरण राव
रेटिंग: दो स्टार

आमिर खान की डेल्ही बेली में अपशब्दों को विस्तार रूप देकर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म की भाषा अंग्रेजी शायद इसी विचार से रखी गयी है ताकि बेझिझक अपशब्दों का इस्तेमाल फिल्म में किया जा सके। चूंकि भारत में अंग्रेजी अपशब्द लोकप्रिय हैं और लोग इसका बुरा भी नहीं मानते। जाहिर है निर्देशक की सोच में कहीं से भी सिंगल स्क्रीन थियेटर के दर्शकों के लिए नहीं। फिल्म निस्संदेह बड़े शहरों के युवाओं को आकर्षित करेगी। जिस तरह के उच्चारण में अंग्रेजी में बात की गयी है, वह आम दर्शक वर्ग के समझ से बाहर है, लेकिन इसके बावजूद चूंकि फिल्म का शानदार तरीके से प्रोमोशन किया गया है। दर्शक फिल्म देखेंगे।

फिल्म तीन दोस्ती की कहानी है। नीतिन, ताशी और अरुप। अरुप कार्टूनिस्ट है। ताशी पत्रकार और नीतिन उसका फोटोग्राफर। नीतिन अपने दोस्तों में सबसे बिंदास, बेफिक्र रहनेवाला है। उसे सड़क किनारे के स्ट्रीट फूड पसंद है। उसकी यही आदत तीनों दोस्तों को मुसीबत में डाल देती है। ताशी की गर्लफ्रेंड इसी दौरान दृश्य में आती है। वह गैंगस्टर के चंगुल में फंस जाती है। नायक की तरह ताशी उसे छुड़ा ले जाता है, लेकिन फिर भी दोनों एक नहीं हो पाते।

डेल्ही बेली ने जिस तरह अपने र्प्रोमोशन में शीट हैप्नस का इस्तेमाल किया है। सच भी यही है कि फिल्म देखने के बाद आप यही महसूस करेंगे कि दुनिया की तमाम गंदगी कैमरे के सामने है। हिंदी सिनेमा में वाकई अब तक इतनी गंदगी का इस्तेमाल नहीं किया गया होगा। फिल्म के कुछ दृश्य को जान बूझ कर बोल्ड बनाने की कोशिश की गयी है। हिंदी सिनेमा में नये सोच, नये प्रयोगों के आधार पर अगर डेल्ही बेली को स्तरीय फिल्म माना जाता है तो भविष्य में अब निर्देशक बनने के लिए अपशब्दों का शब्दकोष भी कंठस्थ करना होगा।

अभिनय के दृष्टिकोण से फिल्म के सभी किरदारों ने अपना अभिनय बेहतरीन तरीके से निभाया है। खासतौर से पूर्णा जगन्नाथ में कई संभावनाएं हैं। साथ ही कुणाल के रूप में अच्छा अभिनेता हिंदी सिनेमा को मिला है। फिल्म परिवार के साथ बिल्कुल नहीं देखी जा सकती है। इन दिनों हिंदी सिनेमा में नया ट्रेंड शुरू हो चुका है। फिल्म में गीतों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। एक लिहाज से यह अच्छा भी है।

कम से कम जबरन गाने दृश्य में नहीं डाले जा रहे। फिल्‍म के अंत में आमिर खान का आयटम सांग 'आइ हेट यू' बेहतरीन है। इसके अलावा फिल्म में किसी भी गाने को विस्तार रूप देकर नहीं दर्शाया गया, जिस गीत को फिल्म की यूएसपी मान कर दर्शकों के सामने प्रोमोशन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, वह गीत फिल्म में केवल फीलर के रूप में ही इस्तेमाल किया गया है।
आमिर खान के चाहने वालों को उस समय तगड़ा झटका लगा जिस समय उन्हें खबर मिली की उनके चहेते सितारे आमिर खान की बहु प्रतिक्षित फिल्म देल्ही बेली आज हर देश में प्रदर्शित हो रही है लेकिन वो पाकिस्तान में रिलीज नहीं होगी। आमिर खान की इस फिल्म में गालियों और अशब्दों का प्रयोग बहुत ज्यादा है इसलिए ये पाकिस्तान में प्रदर्शित नहीं होगी। जिससे की पाकिस्तान में लोग जो कि आमिर खान को काफी पसंद करते हैं उन्हें काफी निराशा हुई है। कराची के सिनेमाहॉल एटरियम सिनेमा ने अपने फेसबुक पेज पर अपडेट किये मैसेज में बताया कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, इस्लामाबाद ने आमिर खान की नई फिल्म "देल्ही-बेली"को पास नहीं किया है, जिसकी वजह से ये फिल्म पाकिस्तान में प्रदर्शित नहीं हो रही है।

आपको बता दें कि आमिर खान की होम प्रोडक्शन फिल्म देल्ही बेली आज देश और दुनिया के सभी सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो गई है। फिल्म में इमरान खान लीड रोल में हैं। जबकि आमिर खान का एक आटम नंबर भी फिल्म में हैं। फिल्म का डी के बोस गाना काफी हॉट है। फिल्म वैसे भी एक सेक्स कॉमेडी है यह फिल्म आप यहाँ देख सकते है ।
manojjaiswalpbt@GMail.com

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शुक्रवार

देल्ही बेली पर पाकिस्तान में लगा प्रतिबंध

at 18:50
मनोज जैसवाल
फिल्म: डेल्ही बेली
कलाकार: इमरान खान, पूर्णा जगन्नाथन, वीर दास, कुणाल रॉय कपूर
निर्देशक: अभिनय देव
निर्माता: आमिर खान, रोनी स्क्रूवाला, किरण राव
रेटिंग: दो स्टार

आमिर खान की डेल्ही बेली में अपशब्दों को विस्तार रूप देकर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म की भाषा अंग्रेजी शायद इसी विचार से रखी गयी है ताकि बेझिझक अपशब्दों का इस्तेमाल फिल्म में किया जा सके। चूंकि भारत में अंग्रेजी अपशब्द लोकप्रिय हैं और लोग इसका बुरा भी नहीं मानते। जाहिर है निर्देशक की सोच में कहीं से भी सिंगल स्क्रीन थियेटर के दर्शकों के लिए नहीं। फिल्म निस्संदेह बड़े शहरों के युवाओं को आकर्षित करेगी। जिस तरह के उच्चारण में अंग्रेजी में बात की गयी है, वह आम दर्शक वर्ग के समझ से बाहर है, लेकिन इसके बावजूद चूंकि फिल्म का शानदार तरीके से प्रोमोशन किया गया है। दर्शक फिल्म देखेंगे।

फिल्म तीन दोस्ती की कहानी है। नीतिन, ताशी और अरुप। अरुप कार्टूनिस्ट है। ताशी पत्रकार और नीतिन उसका फोटोग्राफर। नीतिन अपने दोस्तों में सबसे बिंदास, बेफिक्र रहनेवाला है। उसे सड़क किनारे के स्ट्रीट फूड पसंद है। उसकी यही आदत तीनों दोस्तों को मुसीबत में डाल देती है। ताशी की गर्लफ्रेंड इसी दौरान दृश्य में आती है। वह गैंगस्टर के चंगुल में फंस जाती है। नायक की तरह ताशी उसे छुड़ा ले जाता है, लेकिन फिर भी दोनों एक नहीं हो पाते।

डेल्ही बेली ने जिस तरह अपने र्प्रोमोशन में शीट हैप्नस का इस्तेमाल किया है। सच भी यही है कि फिल्म देखने के बाद आप यही महसूस करेंगे कि दुनिया की तमाम गंदगी कैमरे के सामने है। हिंदी सिनेमा में वाकई अब तक इतनी गंदगी का इस्तेमाल नहीं किया गया होगा। फिल्म के कुछ दृश्य को जान बूझ कर बोल्ड बनाने की कोशिश की गयी है। हिंदी सिनेमा में नये सोच, नये प्रयोगों के आधार पर अगर डेल्ही बेली को स्तरीय फिल्म माना जाता है तो भविष्य में अब निर्देशक बनने के लिए अपशब्दों का शब्दकोष भी कंठस्थ करना होगा।

अभिनय के दृष्टिकोण से फिल्म के सभी किरदारों ने अपना अभिनय बेहतरीन तरीके से निभाया है। खासतौर से पूर्णा जगन्नाथ में कई संभावनाएं हैं। साथ ही कुणाल के रूप में अच्छा अभिनेता हिंदी सिनेमा को मिला है। फिल्म परिवार के साथ बिल्कुल नहीं देखी जा सकती है। इन दिनों हिंदी सिनेमा में नया ट्रेंड शुरू हो चुका है। फिल्म में गीतों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। एक लिहाज से यह अच्छा भी है।

कम से कम जबरन गाने दृश्य में नहीं डाले जा रहे। फिल्‍म के अंत में आमिर खान का आयटम सांग 'आइ हेट यू' बेहतरीन है। इसके अलावा फिल्म में किसी भी गाने को विस्तार रूप देकर नहीं दर्शाया गया, जिस गीत को फिल्म की यूएसपी मान कर दर्शकों के सामने प्रोमोशन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, वह गीत फिल्म में केवल फीलर के रूप में ही इस्तेमाल किया गया है।
आमिर खान के चाहने वालों को उस समय तगड़ा झटका लगा जिस समय उन्हें खबर मिली की उनके चहेते सितारे आमिर खान की बहु प्रतिक्षित फिल्म देल्ही बेली आज हर देश में प्रदर्शित हो रही है लेकिन वो पाकिस्तान में रिलीज नहीं होगी। आमिर खान की इस फिल्म में गालियों और अशब्दों का प्रयोग बहुत ज्यादा है इसलिए ये पाकिस्तान में प्रदर्शित नहीं होगी। जिससे की पाकिस्तान में लोग जो कि आमिर खान को काफी पसंद करते हैं उन्हें काफी निराशा हुई है। कराची के सिनेमाहॉल एटरियम सिनेमा ने अपने फेसबुक पेज पर अपडेट किये मैसेज में बताया कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, इस्लामाबाद ने आमिर खान की नई फिल्म "देल्ही-बेली"को पास नहीं किया है, जिसकी वजह से ये फिल्म पाकिस्तान में प्रदर्शित नहीं हो रही है।

आपको बता दें कि आमिर खान की होम प्रोडक्शन फिल्म देल्ही बेली आज देश और दुनिया के सभी सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो गई है। फिल्म में इमरान खान लीड रोल में हैं। जबकि आमिर खान का एक आटम नंबर भी फिल्म में हैं। फिल्म का डी के बोस गाना काफी हॉट है। फिल्म वैसे भी एक सेक्स कॉमेडी है।
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साहसिक और दिलचस्प है ‘शैतान’!

at 20:56
मनोज जैसवाल : फिल्‍म- ‘शैतान’
कलाकार- कल्कि कोएच्लिन, राजीव खंडेलवाल, शिव पंडित, कीर्ति कुल्हारी, गुलशन देवैया, नील भूपलम
निर्देशक- बिजॉय नाम्बियार
निर्माता- अनुराग कश्‍यप 


इस हफ्ते सिनेमाघरों में ‘देव डी’ की ‘चंदा’ यानी अभिनेत्री कल्कि कोएच्लिन और टेलीविजन कलाकार राजीव खंडेलवाल अभिनीत फिल्‍म ‘शैतान’ प्रदर्शित हुई है।

निर्देशक बिजॉय नाम्बियार की फिल्‍म ‘शैतान’ के पांच मुख्‍य किरदार हैं वे बिगड़ैल नौजवान, जो कोकीन लेते हैं, शराब पीते हैं और मुंबई की सड़कों पर अंधाधुंध गाड़ी चलाते हैं।

यह समू‍ह उन बिगडै़ल अमीर युवाओं का है, जो अपने परिवार से भावनात्‍मक रूप से कट चुका है।

जब उनके हाथों से तेज गाड़ी चलाने से दो मासूस लोग मारे जाते हैं, तब उन्‍हें अपने खिलाफ मामला बंद करने के लिए ढेर सारे पैसों की जरूरत होती है। लेकिन वे अपने माता-पिता से पैसे नहीं मांग सकते, इसलिए उनमें से एक एमी यानी कल्कि जो कि एक अप्रवासी भारतीय है, अपने दोस्‍तों को सुझाती है कि वे उसका अपहरण कर उसके परिवार से फिरौती मांगें।
ऐसा होता भी है, लेकिन जब उनकी यह योजना बुरी तरह से विफल जाती है, तो उनके अंदर का शैतान जाग उठता है और अपना असली गंदा चेहरा दिखाने लगता है।

निर्देशक बिजॉय नाम्बियार ने पहली ही फिल्म में पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी कहानी पेश की है और वह भी एक अच्छी स्टाइल के साथ। कहानी पेश करने के लिए उन्होंने वॉइस-ओवर और फ्लैशबैक का इस्तेमाल बहुत अच्छे ढंग से किया है। शूटाआउट और एक चाल में पीछा करने के दृश्य बहुत ही जानदार बन पड़े हैं। नाम्बियार ने बहुत कोशिश की है कि दर्शक किसी तरह फिल्म के चरित्रों से जुड़ें और उनसे हमदर्दी दिखाएं।
फिल्म में आकर्षण का केंद्र बने हैं राजीव खंडेलवाल, जिन्होंने एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई है।
फिल्म का साउंडट्रैक बहुत अच्छा है, जिस पर छह संगीतकारों ने काम किया है।


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शनिवार

सच्ची घटना के नाम पर घटिया मजाक रागिनी एमएमएस

at 23:47
Ragini MMS
एकता कपूर इस बात से बिल्कुल वाकिफ रखती हैं कि उन्हें किस तरह व किस तरह के दर्शक वर्ग को अपनी फिल्म के लिए आकर्षित करना है। यही वजह है कि एकता कपूर ने अपनी फिल्म रागिनी एमएमएस के प्रोमोशन के लिए आपत्तिजनक प्रोमोशन फंडे अपनाने से भी गुरेज नहीं की। लेकिन शायद एकता इस बात को भूल गयी हैं कि अब दर्शक समझदार हो चुके हैं और वे अपने मनमुताबिक ही फिल्मों को देखना पसंद करते हैं। उन्होंने शुरुआत से ही रागिनी एमएमएस को सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानी बताया है।

अब अगर फिल्‍म की बात करें तो फिल्म के किसी भी दृश्य को देख कर आप यह महसूस नहीं करेंगे कि यह किसी भी सच्ची घटना से प्रभावित है। एकता को यह ज्ञात होना चाहिए कि जब भी किसी सच्ची घटना पर आधारित फिल्म का निर्माण होता है। रिसर्च के दृष्टिकोण से फिल्म में तथ्यपूर्ण बातें जरूर होनी चाहिए, लेकिन उस आधार पर रागिनी बिल्कुल विचारविहीन फिल्म है।

फिल्म में न तो किरदारों का सही तरीके से चयन हुआ है और न ही किसी तरह की शोधपरक बातों को शामिल किया गया है। फिल्ममेकर्स को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि केवल सनसनी फैलानी की कोशिश किसी फिल्म की नहीं होनी चाहिए। रागिनी के माध्यम से यही कोशिश की गयी है, लेकिन सनसनी फैला कर फिल्म हिट कराने का फंडा अब पुराना हो चुका है। रागिनी एमएमएस हर लिहाज से वक्त की बर्बादी है।

कम बजट के नाम पर एक बेहद बकवास व बेफिजूल फिल्म का निर्माण किया है। उदय को एक्टर बनना है जिसके लिए वह अपनी गर्लफ्रेंड रागिनी का अश्लील वीडियो बना कर बेचना चाहता है, लेकिन उसके नापाक इरादे कामयाब नहीं हो पाते। वह एक ऐसी जगह जाकर फंस जाता है और मौत को गले लगा लेता है। जहां शैतानी आत्मा का वास है। रागिनी के अच्छे दोस्त भी इसी क्रम में एक एक कर दम तोड़ देते हैं। शैतानी आत्मा अंत में रागिनी को भी परेशान करती है।

बाकी की डरावनी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी सुनसाल जंगल, अंधेरा, एक औरत, व सन्नाटा सबकुछ है। बस कहानी नहीं है। हां, एक अलग बात यह है कि अंत तक उस शैतानी आत्मा के बारे में कहानी नहीं सुलझती कि वह कौन है और क्यों सबकी हत्याएं करती जाती हैं। कलाकार के रूप में राजकुमार यादव व कैनाज ने खास कमाल नहीं दिखाया है। हालांकि कोशिश अच्छी थी कि किसी किसी वास्तविक घटना से जोड़ कर उसे हॉरर फिल्म के रूप में दर्शाना, लेकिन इसमें निर्देशक पवन पूरी तरह विफल नजर आये हैं। संवादों में बेहद अश्लीलता नजर आयी है। फिल्म पारिवारिक बिल्कुल नहीं। गौरतलब है कि हाल ही में रिलीज हुई हांटेड के बाद शायद ही दर्शक एक और हॉरर फिल्म देखना पसंद करें। रागिनी एमएमएस केवल किसी खास वर्ग के लिए ही दर्शक वर्ग को प्रभावित कर सकती है।


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डराता है कमरा नंबर 404

at 23:26
मनोज जैसवाल 
404 is a must watch for horror fans
फिल्म: 404 (2011)
कलाकार: निशिकांत कामत, इमाद शाह, सतीश कौशिक, टिस्का चोपड़ा
निर्देशक :प्रावल रमन
रेटिंग: तीन स्टार

समीक्षा : 3 डी हांटेड और रागिनी एमएमएस के बाद एक बार फिर 404 के रूप में थ्रीलर फिल्म दर्शकों के सामने है। 3 डी तकनीक की वजह से और रागिनी अपने प्रोमोशन की वजह से दर्शकों को पसंद आयी है। ऐसे में 404 ने न तो खास प्रोमोशन किया है। और न ही किसी खास तकनीक का प्रयोग। इसके बावजूद फिल्म की पटकथा दर्शकों को आकर्षित कर सकती है।

प्रावल रमन ने बेहतरीन निर्देशन किया है। फिल्म की कहानी एक कमरे से शुरू होती है। कमरे का नंबर है 404। और उस कमरे में ही पुरानी कहानी कही जाती है। 404 में कुछ साल पहले मेडिकल स्टूडेंट गौरव रहता था। रैंगिंग की वजह से उसकी मौत हो जाती है। लेकिन फिर से उस कमरे में नया लड़का आता है। उसकी इच्छा है कि वह उसी कमरे में ही रहे।

कहानी में एक रहस्यमय मोड़ आता है और फिर कहानी में दर्शक लीन हो जाते हैं। 404 थ्रीलर के रूप में एक सराहनीय प्रयास है। फिल्म में बिना मतलब के दृश्य नहीं दिखाये गये हैं। न ही अत्यधिक डराने की कोशिश की गयी है। निस्संदेह फिल्म में ड्रामा व डर का मिश्रण तो है लेकिन व अत्यधिक नहीं लगता। गौरव की भूमिका को बेहतरीन तरीके से निभाया गया है। खासतौर से निशिकांत कामत से बेहतरीन अभिनय कराया है। सतीश कौशिक अपने पुराने अंदाज में नजर आये हैं। टिस्का चोपड़ा हमेशा की तरह कम दृश्यों में भी अपनी खूबसूरती के साथ अभिनय के मिश्रण की छाप छोड़ती हैं।


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Stanley Ka Dabba (2011) – Hindi Movie Watch Online

at 23:01
मनोज  जैसवाल


Starring - Divya Dutta, Divya Jagdal, Raj Zutshi, Aditya Lakhia, Rahul Singh, Shiv Kumar Subramaniam

Director - Amol Gupte

Genre - Drama, Social

Movie Info - Not Available

Movie Description - Not AvailableStanley Ka Dabba 2011 Hindi Movie Watch Online

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जरूर चखें स्टैलनी का डब्बा

at 22:14
मनोज जैसवाल 
Stanley Ka Dabba
फिल्मः स्टैलनी का डब्बा
कलाकारः अमोल गुप्ते, दिव्या दत्ता, पार्थो
निर्देशकः अमोल गुप्ते
रेटिंगः 3.5

किसी भी सामाजिक मुद्दे को प्रस्तुत करने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे लोगों के सामने शोर मचा कर ही प्रस्तुत किया जाये। एक सामान्य सी दिल छू देनेवाली कहानी भी आपके सामने कई बातें कह जाती हैं। अमोल गुप्ते की फिल्म स्टैनली का डब्बा इस राह वाकई एक बेहतरीन फिल्म है। निर्देशक अमोल गुप्ते ने अपनी काल्पनिक दुनिया में बैठ कर बाल मजदूरी के विषय पर एक ऐसी भावविभोर हो जानेवाली कहानी लिखी है,जिसे देख कर आपकी आंखें नम निश्चित तौर पर होंगी।

तारें जमीं में निदर्ेशन न कर पाने का मलाल उन्हें हमेशा रहा, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस फिल्म में एक भी बारीकी नहीं छोड़ी। हर संवाद हर शब्द व दृश्यों को खूबसूरती से उकेरा गया है। फिल्म में न लंबे दृश्य हैं या अत्यधिक किरदार। बहुत देर तक लोगों के सामने किसी भी मुद्दे को विश्लेषित करते हुए भी नहीं दिखाया गया है। इसके बावजूद फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है।

यह कहानी है स्टैलनी की। स्टैलनी अपने स्कूल में सबसे होनहार छात्र है। उसे स्कूल के सभी टीचर प्यार करते हैं। वह कहानी कहने व कविताएं बनाने में भी उस्ताद है। उसकी एक टीम भी है। जिसके दोस्त उसे बेहद प्यार करते हैं। फिल्म की कहानी में एक अहम मुद्दे को डब्बे के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है। स्टैलनी अच्छा गाता है, अच्छा डांस करता है और अच्छी कविताएं भी बनाता है। अपनी हरकतों से ही वह औरों से अलग है।

होली स्कूल के कई टीचर उससे प्यार करते हैं लेकिन रोजी मिस उसे सबसे अधिक चाहती है। इन्हीं शिक्षकों में से एक है वर्माजी। वर्माजी को दूसरों का डब्बा खाने की बुरी लत है। वे खुद दूसरों का डब्बा खाते हैं लेकिन स्टैलनी के डब्बे न लाने की वजह से वे उसे बातें सुनाते हैं और स्कूल से बाहर निकाल देते हैं। कहानी यहां से मोड़ लेती है और धीरे धीरे स्टैलनी के बारे में दर्शकों को एक ऐसी सच्चाई पता चलती है जिसके बाद दर्शक दंग रह जायेंगे।

यह यकीनन मानना होगा कि शिक्षक व छात्र के बीच के रिश्ते को सोचने व सहजेने में व फिर उसे कहानी के रूप में गढ़ने में अमोल गुप्ते का जवाब नहीं। उन्होंने तारें जमीं पर के माध्यम से भी बेहतरीन तरीके से एक शिक्षक व छात्र की कहानी गढ़ी। इस फिल्म के माध्यम से भी अमोल गुप्ते ने शिक्षकों के मन की मनःस्थिति को समझने की कोशिश की है। गौर करें, तो इस फिल्म में यह भी बात गौर करनेवाली है। शिक्षक व लालची वर्मा की स्थिति भी कभी बचपन में शायद स्टैलनी की तरह ही रही होगी। चूंकि दोनों ही किसी न किसी वजह से डब्बा नहीं लाते।

स्टैलनी जैसे बच्चों की कहानी उन तमाम बच्चों की कहानी है जो पढ़ाई के साथ साथ गुजारे के लिए होटलों में भी काम करते हैं। अमोल गुप्ते ने एक लालची टीचर की भूमिका के साथ पूरी तरह न्याय किया है। उनके हाव-भाव, मेकअप और उनके संवाद वर्माजी के किरदार में बिल्कुल फिट बैठे हैं। पार्थो के रूप में बॉलीवुड को एक और बेहतरीन बाल कलाकार मिला है।

दिव्या दत्ता ने अपना किरदार बखूबी निभाया है। फिल्म की एक और खास बात है फिल्म की शुरुआत में फिल्म की कहानी को एनिमेशन के माध्यम से प्रस्तुत करना। इस तरह की फिल्मों से यह उम्मीद जगती है कि जरूरी नहीं कि फिल्म बहुत लंबी हो। अमोल ने इस फिल्म के माध्यम से वर्तमान दौर में बन रही फिल्मों को यह सीख दी है कि वर्तमान दौर में इस तरह की ईमानदार कोशिशों वाली कहानियों को हिंदी सिनेमा में प्राथमिकता दिया जाना जरूरी है। फिल्म के गीत फिल्म की कहानी के आधार पर बिल्कुल उपयुक्त हैं।;
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टैगोर की अलमारी से निकली बेहतरीन कशमकश

at 21:38
मनोज जैसवाल :शनिबार मई 28, 2011,16:48

Kashmakashफिल्मः कशमकश
कलाकारः रिया सेन, राइमा सेन, प्रसन्नजीत चटर्जी
निर्देशक : रितुपर्णो घोष
रेटिंग: 3.5

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित रचना नौका डूबी पर अब तक कई फिल्मों का निर्माण किया जा चुका है। इसकी खास वजह यही है कि इस रचना में एक ऐसा गुर रहस्य छुपा है, जिसे देख कर दर्शक भूल जाते हैं कि वे किसी फिल्म की दुनिया में है।

कश्मकश फिल्म सुभाष घई द्वारा निर्मित बांग्ला फिल्म नौका डूबी का हिंदी संस्करण है। इस फिल्म की ही यह खूबसूरती थी, जिसकी वजह से इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में भी शामिल किया गया था। जिस तरह रवींद्र अपनी रचनाओं में बेहद सृजनशील नजर आते थे। उसी तरह इस फिल्म में भी कल्पनाशीलता, सृजनशीलता का खास ख्याल रखा गया है।

रितुपर्णो घोष तो इस विधा में हमेशा से ही माहिर रहे हैं। अपनी कहानी, उसकी सोच, और उसका प्रस्तुतिकरण हमेशा ही लाजवाब होता है। कुछ इसी का मिश्रण कश्मकश में भी नजर आया है। इस फिल्म के सारे किरदारों ने जीवंत अभिनय किया है। ऐसा लग रहा है मानो सबको बस रवींद्रनाथ टैगोर ने आकर खुद कह दिया है कि आप यह किरदार हैं आप यह किरदार हैं।

सभी किरदारों ने सजीव प्रस्तुतिकरण दिया है। सुभाष घई जैसे निर्देशकों द्वारा इस तरह की फिल्मों को हिंदी दर्शक तक पहुंचाने के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए। इस फिल्म के कई दृश्य में आपको पुराना बनारस और कोलकाता तब कलकत्ता था नजर आता है। फिल्म के लोकेशन, पहनावे में भी रितुपर्णो ने खूबसूरती से वह अंदाज बयां किया है। हिंदी फिल्मों के निर्देशकों को इस फिल्म से खासतौर से यह सीख जरूर लेनी चाहिए कि लोकेशन तैयार करते वक्त किस तरह बारीकियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

फिल्म में रवींद्र संगीत की अहमियत को खूबसूरती से उकेरने की कोशिश की गयी है। उस पर गुलजार के लिखे गीत लाजवाब हैं। कश्‍मकश आपको फ्लैशबैक में लिये चलती है। जहां उस दौर में भी लोगों के बीच एक अलग तरह की समझदारी की कहानी है। बाप-बेटी, के बीच की कहानी व उनकी समझ को कहानी में खूबसूरती से पिरोया गया है। टैगोर की रचनाओं की यह भी खासियत है कि उनकी रचनाओं में महिला पात्रों को अलग तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

इस लिहाज से भी यह फिल्म देखने उपयुक्त है। दोनों बहनों रया और राइमा ने फिल्म में कमाल का अभिनय किया है। वैसे दर्शक जो वाकई कलात्मक फिल्में देखना पसंद करते हैं और पुराने दौर की किस्से कहानियां सुनना चाहते हैं। वे इसे जरूर देखें।
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