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सोमवार

भारतीय रेल सुरक्षा मानकों पर कई प्रश्नचिन्ह !

at 22:35
मनोज जैसवाल 
रेल दुर्घटनापिछले दो हफ़्तों में तीन बड़ी रेल दुर्घटनाओं ने भारतीय रेल सुरक्षा मानकों पर कई प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं.
भारत का रेल नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक हैं. भारतीय ट्रेनों में हर दिन सवा करोड़ से ज़्यादा लोग सफ़र करते हैं.
लेकिन देश में आए दिन हो रही रेल दुर्घटनाओं से सवाल ये उठता है कि रेल यात्रियों की जान की क्या कोई क़ीमत नही?
 इसी संदर्भ में बात की रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष आईएमएस राणा से. उनसे बातचीत के कुछ अंश.
पिछले दो हफ़्तों में देश में तीन बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. इन दुर्घटनाओं के बाद भारत के रेल सुरक्षा मानकों को लेकर क्या संदेश जाता है?
एक रेल दुर्घटना के पीछे कभी-कभी एक से ज़्यादा कारण होते हैं. चूंकि हमारा रेलवे नेटवर्क बहुत बड़ा है, तो रोज़ किसी न किसी सुरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी हो जाने के कारण ऐसी दुर्घटनाएं हो जाती हैं.
हालांकि भारतीय रेल नेटवर्क में पिछले कुछ सालों में सुरक्षा मानकों में सुधार आया है, लेकिन 100 प्रतिशत सुरक्षा को कभी हासिल नहीं किया जा सका है. लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि पिछले कुछ सालों में रेल दुर्घटनाओं में कमी आई है.
लेकिन एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में हर साल औसतन 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएं होती हैं. भारत का रेल नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है, तो ऐसे में यात्री की सुरक्षा सुनिश्चित किया जाना इतना मुश्किल क्यों है? जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है, तो मुआवज़े की घोषणा कर दी जाती है और फिर उसे भुला दिया जाता है. ऐसा क्यों?
ऐसी बात नहीं है. लोगों की जान बहुत क़ीमती है. अगर देखा जाए तो भारत में सड़क दुर्घटनाओं में हर दिन 100 से ज़्यादा लोग मारे जाते हैं.
हालांकि रेलवे मंत्रालय का लक्ष्य है कि एक भी रेल दुर्घटना न हो, लेकिन इस लक्ष्य को पूरा करना नामुमकिन है. लेकिन मैं इस बात पर भी ज़ोर देना चाहूंगा कि पिछले कुछ सालों में रेल दुर्घटनाओं में कमी आई है.

आपने कहा कि रेलवे मंत्रालय का लक्ष्य है कि कोई रेल दुर्घटना न हो, लेकिन ऐसा सुनिश्चित करने के लिए रेल बजट का कितना हिस्सा सुरक्षा मानकों को सुधारने के लिए दिया जाता है?
दरअसल रेलवे बजट को इस तरह विभाजित नहीं किया जाता. जितना भी बजट रेलवे को दिया जाता है, उसका ज़्यादातर भाग परोक्ष रूप से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही किया जाता है.
रेलवे सुरक्षा के कई पहलू होते हैं लेकिन प्रबंधन के स्तर से ये सभी पहलू जुड़ जाते हैं. होता ये है कि रेलवे विभाग ट्रेन सेवाएं तो बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके कारण सुरक्षा का मुद्दा भी प्रभावित होता है.
राजनीतिज्ञों और प्रबंधकों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि रेलवे सिस्टम को एक तय सीमा के पार न खींचा जाए. रेलवे सेवाएं और सुरक्षा प्रदान करने के बीच एक संतुलन बनाए जाने की ज़रूरत है.
अगर भारतीय रेलवे सुरक्षा मानकों को वैश्विक स्तर पर देखा जाए, तो ब्रिक जैसे समूह का हिस्सा होने के नाते भारत इतना पीछे क्यों है? चीन को ही ले लीजिए. जब भी किसी पड़ोसी देश से तुलना की बात आती है, तो भारत हर स्तर पर चीन से बराबरी करना चाहता है. चीन का रेलवे सिस्टम पूरे विश्व में प्रसिद्ध है. भारत इतना पीछे क्यों?


एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में हर साल 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएं होती हैं.
रेल दुर्घटनाभारत में रेलवे विभाग के पास बहुत ही सीमित संसाधन हैं. हालांकि सुधार की बहुत गुंजाइश है, लेकिन हमारा राजनीतिक और आधिकारिक तंत्र प्रणाली में सुधार लाने की कोशिश में लगे हैं.
रेलवे विभाग को देश के दूसरे विभागों से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता क्योंकि सभी विभाग अर्थव्यवस्था के हिसाब के चलते हैं. रेलवे विभाग को जिस तरह का बजट दिया जाता है, वो उसके हिसाब से ही आगे बढ़ती है.
रेलवे मंत्रालय के बारे में धारणा ये बन गई है कि हर सरकार इस विभाग का प्रभार अपनी सहयोगी पार्टी को एक तोहफ़े के रूप में सौंप देती है. तो ऐसे में क्या ये कहा जा सकता है कि रेलवे मंत्रालय को गंभीरता से नहीं लिया जाता?


मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं. हालांकि इस मंत्रालय को हर बार इसी रूप में देखा जाता है कि इसे वोट हासिल करने का एक ज़रिया बना दिया जाता है.
लेकिन किसी न किसी को तो ये प्रभार मिलता ही है, तो फिर सहयोगी पार्टी को क्यों नहीं? गठबंधन सरकार में ये सब मुद्दे आड़े आ जाते हैं, लेकिन आख़िरकार ये तो मंत्री की मर्ज़ी है कि वो अच्छा काम करे या नहीं.
हालांकि रेलवे प्रबंधन बेहतरीन काम करता है, लेकिन अगर मंत्री चाहे तो बहुत सुधार किया जा सकता है. तो मैं ये कहूंगा कि जहां थोड़ी बहुत चीज़ें ग़लत होती हैं, वहीं कुछ अच्छी चीज़ें भी देखने को मिलती हैं.
पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी की बात की जाए, तो कहा जाता है कि जब उन्होंने रेल मंत्रालय का प्रभार संभाला, तबसे ही उनका ध्यान मंत्रालय पर कम और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर ज़्यादा रहा है.
ख़ैर ये बात तो सारा देश जानता है कि ममता बनर्जी का ध्यान रेलवे मंत्रालय पर कम और पश्चिम बंगाल पर ज़्यादा रहा है.
ऐसी बातें ही प्रणाली में आड़े आती हैं. विभाग में ज़्यादातर पद ख़ाली पड़े हैं और उसके लिए मंत्रालय ही ज़िम्मेदार है. मेरे हिसाब से ये बिलकुल ठीक नहीं है.
manojjaiswalpbt@GMail.com

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शुक्रवार

पांच लाख रुपए वार्षिक आय वाले वेतनभोगियों को अब आयकर रिटर्न भरने की छूट

at 02:09
मनोज जैसवाल : इससे संबंधित अधिसूचना जारी कर दी गई है.वित्त मंत्रालय ने आज यहां बताया कि केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है.
वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वित्त वर्ष 2011-12 के बजट में इसकी घोषणा की थी.

मंत्रालय के अनुसार आकलन वर्ष 2011-12 के लिए आयकर रिटर्न भरने की अंतिम तिथि 31 जुलाई है लेकिन ऐसे व्यक्ति को आयकर रिटर्न भरने की आवश्यकता नहीं होगी. जिसकी वार्षिक वेतन से आय पांच लाख रुपए तक है.

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इसके दायरे में सिर्फ ऐसे वेतनभोगी आएंगे जिन्हे सिर्फ एक नियोक्ता से वेतन मिलता है.

इसके तहत सभी प्रकार की कटौतियों के बाद अधिकतम आय पांच लाख रुपए तक होनी चाहिए और बचत खाता से जमा पर अधिकतम 10 हजार रुपए की ब्याज आय हुई हो.

मंत्रालय के अनुसार इस तरह के कर्मचारियों को स्थायी खाता नंबर (पैन) और ब्याज से हुई आय की पूरी जानकारी अपने नियोक्ता को देनी होगी और उसे स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) का भुगतान करना होगा. ऐसे कर्मचारियों को नियोक्त से फार्म-16 लेना होगा.

मंत्रालय ने कहा है कि एक से अधिक नियोक्ताओं से वेतन लेने, वेतन से अतिरिक्त अन्य आय वाले और बचत खाता से ब्याज आय प्राप्त करने वाले या रिफंड का दावा करने वाले कर्मचारी इस छूट का लाभ नहीं उठा सकते हैं.

इसके साथ ही आयकर अधिनियम 1961 की धारा 142 (1) या उपधारा 148 या 153 ए या उपधारा 153 सी के तहत आयकर रिटर्न भरने के नोटिस पाने कर्मचारी भी इस छूट के दायरे में नहीं आएंगें.

सीबीडीटी के अध्यक्ष प्रकाश चंद्र ने गुरूवार को बताया सीबीडीटी ने योजना को अधिसूचित कर दिया है. इसमें पांच लाख रुपए तक की सालाना आय वाले वेतनभोगियों को आयकर रिटर्न भरने से छूट दी गई है. ऐसे वेतनभोगियों को निर्धारण वर्ष 2011-12 के लिये अब रिटर्न भरने की जरुरत नहीं होगी.

चंद्र ने स्पष्ट किया वर्ष 2010-11 में कुल मिलाकर पांच लाख रुपए तक की आय पर जरुरी कटौती आदि, एक नियोक्ता से प्राप्त वेतन और बचत बैंक खाते से 10,000 रुपए तक की ब्याज आय वाले व्यक्तियों को आयकर रिटर्न नहीं भरनी होगी.

उन्होंने कहा कि यह योजना उन व्यक्तियों पर लागू नहीं होगी जिन्होंने किसी एक वित्तीय वर्ष में दो अथवा दो से अधिक नियोक्ताओं से वेतन लिया है. नौकरी बदलने की स्थिति में यह होता है.

सीबीडीटी अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे लोग भी इस योजना का लाभ नहीं उठा सकेंगे. जिनकी वेतन और ब्याज को छोड़कर अन्य सोतों से कोई आय है.

ऐसे व्यक्ति जिन्हें आयकर अधिनियम 1961 की धारा 142 (1) अथवा 148 और 153 ए अथवा 153सी के तहत आयकर रिटर्न भरने का नोटिस जारी किया गया है.

पेंशनरों के मामले में प्रकाश चंद्र ने कहा पेंशनरों को भी इस योजना का लाभ मिलेगा. बशर्ते कि उनकी ब्याज आय, करयोग्य पेंशन और वेतन आदि मिलाकर सालाना आय पांच लाख रुपए तक हो.

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे वेतनभोगी व्यक्ति जिन्हें आयकर का रिफंड लेना है उन्हें भी रिटर्न भरना होगा. उन्होंने कहा कि योजना के तहत नियोक्ता की तरफ से दिया जाने वाला फार्म-16 ही आयकर रिटर्न के तौर पर माना जाएगा.

इससे पहले सभी वेतनभोगी व्यक्तियों को आयकर अधिनियम 1961 के तहत हर साल कर रिटर्न भरनी जरूरी थी.

सरकार के इस कदम से करीब 85 लाख आयकरदाताओं को राहत मिलेगी.

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बुधवार

आज याद आई है एक दोस्त की

at 01:04
मनोज जैसवाल : ज़िंदगी में आगे बढ़ना मजबूरी है पीछे छूट जाना नियति. मजबूरी आपको बड़ा आदमी बना सकती है. नियति आपको वहीं रख सकती है जहां आप रह जाते हैं. लेकिन बड़े होने में वो आनंद कहां जो रुके होने में हैं. बुद्ध रुके रहे तो बुद्ध कहलाए. हम लोग चलते रह गए. बुद्ध तो क्या बुद्धिमान भी नहीं हो पाए.

मजबूरी में चले थे आज भी मजबूर हैं सो चल रहे हैं जब सूकून होगा तो रुकेंगे और बड़े बुजुर्ग कहते हैं. सूकून मिल जाए तो ज़िंदगी किस काम की.

आज याद आई है एक दोस्त की जिसके साथ दुपहरिया में कच्चे आम तोड़ा करते थे और पहा़ड़ों पर घंटों बैठकर ऊपर से छोटी लगने वाली कॉलोनी को घंटों निहारा करते थे.

झरने के पानी में पत्थर फेंक पर अपनी सपनों की रानी को याद किया करते थे और जब घर में बाइक आई तो दोनों उस पर बैठ कर कॉलोनी की एक गली के खूब चक्कर काटा करते थे.

माशूका को पता नहीं होता था और उसके लिए मार पीट करने पर आमादा होने पर यही दोस्त काम आता था. बिना किसी सवाल जवाब के. उसका एक ही धर्म था..मैंने जो कह दिया बस वही सही है. उसके मामले में मेरा भी यही धर्म था. उसने जो कहा वही सही. मां बाप भाई बहन सब बेकार.

ये खूब चलता है कुछ साल. नए कपड़े, बाइक, लड़कियां, दोस्ती वाली फ़िल्में...फिर या तो एक लड़की आती है या फिर ज़िंदगी आती है और रास्ते खुद ब खुद बदलते हैं.

मैं मजबूर था कॉलोनी छोड़ने को उसकी नियति थी वहीं रुकना. चार पांच साल तक संपर्क रखा फिर मैं बड़ा आदमी हो गया. वो इंसान ही रहा. बड़े शहर के शब्दों में बैकवार्ड और यू नो कॉलोनी पीपुल.

आखिरी बार उसका फोन आया था. उसे क़ानून की पढ़ाई करने के लिए पांच हज़ार रुपए चाहिए थे. मैंने वादा किया था मदद का लेकिन याद नहीं रहा. अब हर साल कॉलोनी जाता हूं और मेरी आंखें उसे तलाश करती हैं.

उसके पापा भी रिटायर हो चुके हैं. कॉलोनी से दूर वो कहीं रहता है. उधर से ट्रेन गुज़रती है तो खिड़की के पास बैठ जाता हूं. शायद वो कहीं दिख जाए. खोजने नहीं जाता हूं डरता हूं मिल जाए तो क्या जवाब दूंगा.

सुना है किसी कोर्ट में प्रैक्टिस करता है. शादी भी हो गई है. छोटे से कस्बे में वो रुका हुआ है. शायद खुश भी हो. रुकना उसकी नियति थी.. मैं अभी भी चल रहा हूं. क्योंकि मैं मजबूर हूं और चलते रहना ही शायद मेरी नियति है.

आलेख : सुशील जी से प्रेरित

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मंगलवार

क्या है ई-कोलाई

at 23:29
मनोज जैसवाल :  खीरे और कुछ अन्य सब्ज़ियों के ज़रिए ई-कोलाई बैक्टीरिया का संक्रमण लोगों तक पहुँच रहा है, अब तक इस संक्रमण की वजह से 14 लोगों की मौत हो गई है और सैकड़ों लोग बीमार हो गए हैं.
इस संक्रमण के बारे में कुछ ज़रूरी जानकारियाँ.
ई-कोलाई क्या है?
ई-कोलाई इशचेरिचिया कोलाई का संक्षिप्त रूप है. यह एक तरह का बैक्टीरिया है जो मनुष्यों और पशुओं के पेट में हमेशा रहता है, इस बैक्टीरिया के ज्यादातर रूप हानिरहित हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं जो पेट में मरोड़ और दस्त जैसे लक्षण पैदा करते हैं, कई बार इनकी वजह से लोगों का गुर्दा काम करना बंद कर देता है और संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है.
मौजूदा संक्रमण के बारे में क्या जानकारी है?
इस बार जर्मनी से शुरू हुए संक्रमण में लोगों के गुर्दे और स्नायुतंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. इस अवस्था को हिमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम कहते हैं.
इस बार के संक्रमण में खूनी दस्त, गुर्दे की नाकामी और मिर्गी के दौरे जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं.
ज्यादातर लोगों में ई-कोलाई बैक्टीरिया का जो रूप पाया गया है उसका नाम ई-कोलाई 0104 है, जो आम नहीं है.
अब तक ई-कोलाई के ज्यादातर मामलों की असली वजह 0157 रहा था, बैक्टीरिया के उस रूप से संक्रमित लोगों के लक्षण भी इसी तरह के होते हैं.
संक्रमण लोगों तक पहुँचा कैसे?
यह संक्रमण आम तौर पर माँस के ज़रिए लोगों तक पहुँचता है लेकिन इस बार इसका माध्यम सब्ज़ियाँ हैं. जर्मन अधिकारियों का कहना है कि स्पेन से आयात किए गए खीरे में ई-कोलाई बैक्टीरिया पाया गया है.
अच्छी तरह पकाए गए खाने में ई-कोलाई बैक्टीरिया के बचने की संभावना समाप्त हो जाती है, फल और कई सब्जियाँ अक्सर कच्ची खाई जाती हैं इसलिए संक्रमण फैल रहा है.
ई-कोलाई बैक्टीरिया पशुओं के मल के ज़रिए खीरे में किसी तरह पहुँचा जहाँ से वह लोगों के पेट में जा रहा है, अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि ऐसा गायों के गोबर के खाद के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की वजह से हुआ होगा.
संक्रमण से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
 अधिकारियों ने लोगों को हिदायत दी है कि वे खीरा, टमाटर और गाजर जैसी चीज़ें कच्चा न खाएँ.
इस संक्रमण के जर्मनी से बाहर फैलने की ख़बर अब तक नहीं आई है.
जानकारों का कहना है कि अगर फलों और सब्ज़ियों को अच्छी तरह धोकर या छीलकर खाया जाए तो ख़तरा नहीं है, डॉक्टरों का कहना है कि ई-कोलाई बैक्टीरिया फल-सब्ज़ियों के ऊपर है, न कि उनके भीतर.
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शनिवार

खतरनाक भी हो सकती हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स

at 20:12
मनोज जैसवाल : वैसे तो भारत में अनेक सोशाल नेटवर्किंग साइट्स चल रही हैं, पर उनमें से लोकप्रिय फेसबुक, ऑरकुट और ट्विटर को ही कहा जा सकता है। जवान, बूढ़े एवं बच्चे सभी आज इसके दीवाने हैं। युवाओं के बीच इसकी दीवानगी व लोकप्रियता अद्भुत है। विश्‍व को एक गाँव में तब्दील करने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। आज आप एक छोटे से गाँव में रहकर भी अपने को अपने रिश्‍तेदारों तथा दोस्तों से जोड़कर रखने की कल्पना को साकार कर सकते हैं।

इसकी वजह से आपको कभी भी अपने अजीज से बिछड़ने का अहसास तक नहीं होगा। इसकी सहायता से आप हर रोज, हर पल अपने चाहने वालों के साथ रह सकते हैं।

अपनी खुषी व गम को उनके साथ बाँट सकते हैं। रोजगार चाहने वाला या व्यापार करने की चाहत रखने वाला या फिर अपनी किसी नई रचना के प्रचार-प्रसार करने की तमन्ना रखने वाला या प्रकाषक से नाउम्मीद होने के बाद अपनी किताब को स्वंय प्रकाषित करके उसे बेचने के लिए उत्सुक रहने वाला हर षख्स आसानी से सोषल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से अपने मन की मुराद को पुरा कर सकता है।

आजकल तो पुलिस भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए अपराधियों को पकड़ रही है। इसकी मदद से भागम-भाग की जिंदगी के बीच भी लोग अपने पुराने दोस्तों से मिल रहे हैं। उनसे संवाद कायम करके फिर से संबंधों की गर्माहट को पुर्नजीवित कर रहे हैं। संवादहीनता की स्थिति को समाप्त करने में सोषल नेटवर्किंग साइट्स का योगदान सचमुच अतुलनीय है। सच कहा जाए तो यह संप्रेषण का अमूल्य जरिया बन चुका है। भारत के संदर्भ में बात करें तो यहाँ सबसे पहले ऑरकुट सबकी पहली पंसद थी, बाद में उसकी जगह फेसबुक ने लिया और अब ट्विटर का जमाना है।

जाहिर है जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, ठीक उसी तरह सोशल नेटवर्किंग साइट्स से लाभ के साथ-साथ नुकसान भी हैं। ध्यातव्य है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स में किसी के पहचान का अंकेक्षण नहीं किया जा सकता है और न ही आसानी से अपराधी प्रवृति वाले इसके सदस्यों की करतूतों पर आप अंकुश लगा सकते हैं। इस मामले में साइबर लॉ अभी भी बहुत कमजोर है। भारतीय पुलिस की साइबर षाखा न तो अधतन तकनीक से लैस है और न ही तकनीकी तौर दक्ष व सक्षम। इस कारण से इसके बरक्स में पुलिस की विवेचना का सरलता से कभी भी कोई परिणाम नहीं निकल पाता है।

इंसान से बड़ा कोई जानवर नहीं है, इस बात को साबित अब तक लाखों लोग सोषल नेटवर्किंग साइट्स के द्वारा घिनौना अपराध करके कर चुके हैं। अपराधों के मुमकिन होने के पीछे मूल कारण किसी भी सदस्य के पहचान की वास्तविकता पता नहीं चलना है। उल्लेखनीय है कि विविध सोषल नेटवर्किंग साइट्स में खुले फर्जी खातों की वास्तविक संख्या की जानकारी किसी को भी नहीं है।

लिहाजा अगर आप इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स के सदस्य हैं और किसी उलझन में उलझने से बचना चाहते हैं तो आपको ही अपने तथाकथित दोस्तों के बीच में कौन दोस्त की षक्ल में भेड़िया बना हुआ है, इसका पता लगाना होगा, अन्यथा किस लड़की की अश्‍लील सीडी कब इंटरनेट पर डाली जाएगी या फिर कब किस लड़की को ब्लेकमेल किया जाएगा, इसका अंदाजा न तो आप लगा पायेंगे और न ही पुलिसवाले।

आज की तारीख में आतंकवादी से लेकर गली के गुंडे सभी इन सोशल साइट्स से अपने धंधे को चमका रहे हैं। वर्तमान हालात में जरुरत इस बात की है कि सरकार कम-से-कम इन पर अपना पूरा नियंत्रण रखने में सक्षम हो। सक्षम होना तथा अपनी सक्षमता का उपयोग करना दो चीज है। भारत एक लोकतांत्रिक देष है, वह कभी भी चीन की तरह तानाशाह नहीं हो सकता है। पर अफसोस की बात यह है कि भारत सरकार अभी भी तकनीकि तौर पर पिछड़ी हुई है। यहाँ की साइबर पुलिस की व्यवस्था वाकई में बहुत लचर है। ऐसे में सोषल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से लगातार अपराध का होते रहना फिलवक्त लाजिमी है।

अभी कुछ दिनों पहले ट्विटर पर बने एआईडीएमके के महासचिव जे जयललिता के फर्जी खाता का खुलासा हुआ। गौरतलब है कि जया के इस खाते में जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी एवं प्रसिद्ध स्तंभकार एस गुरुमूर्ति बतौर फॉलोवर्स शामिल हैं। हालांकि कुल फॉलोवर्स की संख्या 500 से भी ज्यादा है। जे जयललिता के इस खाते में बेहद ही अहम् बातें लिखी गई हैं। इस खाते में यह भी लिखा गया था कि 2 फरवरी को कोई घटना घट सकती है।

ज्ञातवय है कि 2 फरवरी को ए राजा की गिरफ्तारी के बाद पुनः इस खाते में लिखा गया कि मैंने क्या कहा था? इसी खाते में लिखा गया कि 'केंद्रीय मंत्री (कपिल सिब्बल) को स्वामी का बकाया पैसा देना ठीक नहीं है" इसके प्रत्यूत्तर में स्वामी ने लिखा कि 'उनका पैसा आईआईटी, दिल्ली के समय से बकाया है। मामला नहीं सुलझने पर वे अदालत का सहारा लेंगे"।

जानकारों का मानना है कि जे जयललिता अपने विचार को इस तरह से व्यक्त नहीं कर सकती हैं। यह काम उस व्यक्ति का हो सकता है जो जे जयललिता का खास है या रहा है। इस खाता के फर्जी होने की संभावना इसलिए भी अधिक है, क्योंकि जे जयललिता ने अपने नाम के नीचे यह डिस्क्लेमर दिया है कि 'यह पैरोडी है"। स्तंभकार एस गुरुमूर्ति भी इस तर्क से सहमत हैं। उनका कहना है कि आरंभ में ट्विटर पर जे जयललिता का बना खाता असली लग रहा था, पर मैं पूरी तरह से आष्वस्त नहीं था। इसलिए असलियत जानने के लिए मैंने कुछ निजी संदेष दिया और संदेह होने पर खुद को उससे अलग कर लिया।

लब्बोलुबाव के तौर पर कहा जा सकता है कि सोषल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्त बनाने में जल्दबाजी नहीं करें। अनजान लोगों से कभी भी दोस्ती नहीं करें। अपने स्तर पर छानबीन करें तथा आष्वस्त होने के बाद ही किसी के दोस्त बनाने के आग्रह को कुबूल करें। इस बाबत अपने जानने वालों पर संदेह करने में भी कोई बुराई नहीं है। अपने फॉलोवर्स तथा दूसरे का फाॅलोअर्स बनने से पहले भी सावधानी बरतें, क्योंकि आपकी गलती या लापरवाही आपको एक ऐसे दलदल में ढकेल सकती है, जहाँ से निकलना शायद संभव न हो।

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स्पीक एशिया के खाते सील, लाखों लोगों का पैसा डूबा

at 19:24
मनोज जैसवाल : क्‍या आपने ऑनलाइन सर्वे कंपनी स्‍पीक एशिया में 11 हजार रुपए लगाये हैं? अगर हां, तो आपका पैसा अब फंस चुका है। लाखों लोगों को झटपट पैसा कमाने का लालच देकर करोड़ों रुपए अंदर कर चुकी स्‍पीक एशिया की कलई खुल चुकी है। भारतीय रिजर्व बैंक और यूनाइटेड ओवरसीज बैंक सिंगापुर ने शुक्रवार देर शाम इस कंपनी के सभी खाते सील कर दिये।

रिजर्व बैंक ने खाते सील करने के बाद महाराष्‍ट्र, उत्‍तर प्रदेश, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, झारखंड और दिल्‍ली में स्थित स्‍पीक एशिया के दफ्तरों पर छापेमारी शुरू कर दी है। पहली छापेमारी कानपुर में हुई उसके बाद लखनऊ व अन्‍य शहरों में। छापेमारी का दौर जारी है। आयकर विभाग को कार्यालयों में जो भी दस्‍तावेज मिल रहे हैं, वो सभी जब्‍त कर लिये जा रहे हैं।

देश भर में करीब 20 लाख लोग स्‍पीक एशिया में करीब 2000 करोड़ रुपए लगा चुके हैं। स्‍पीक एशिया के सदस्‍यों की बात करें तो मध्‍य प्रदेश में 50 हजार, उत्‍तर प्रदेश में 15 लाख, गोवा में 20 हजार हैं। यह आंकड़े भी प्रारंभिक जांच से प्राप्‍त हुए हैं। सदस्‍यों की संख्‍या बढ़ भी सकती है।

हाल ही में स्‍पीक एशिया के अधिकारियों ने एक प्रेसवार्ता करके खुद को पाक-साफ बताया था, लेकिन मीडिया के सवालों के जवाब देने में असमर्थ रहे थे। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार इस कंपनी में लगे अरबों रुपए कैसे वापस लाती है। सरकार पैसा वापस लाये या नहीं, लेकिन उन आम लोगों का क्‍या होगा, जिनका पैसा इसमें लग चुका है।

कैसे चलती थी चेन

स्‍पीक एशिया की चेन के अंतर्गत आपको किसी सदस्‍य के साथ जुड़ना होता था। सदस्‍यता लेने के लिए 11 हजार रुपए देने होते थे। उस समय यह लालच दिया जाता था कि 11 हजार देने के बाद तीन महीने में आपका पेसा वसूल हो जायेगा। यानी कंपनी चार-चार हजार रुपए हर महीने देगी। आपको बस इंटरनेट पर जाकर एक सर्वे में क्लिक करना होगा। कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर विश्‍व की तमाम मल्‍टीनेशनल कंपनीज़ को अपना क्‍लाइंट बताया और कहा कि ये सर्वे उन्‍हीं कंपनियों के लिए किये जाते हैं।

जाहिर है बड़ी कंपनियों के नाम आते ही आम आदमी आसानी से बेवकूफ बन सकता है। कंपनी कभी सदस्‍यों के अकाउंट में सीधे पैसा नहीं डालती। पैसा आता था वो भी डॉलर में और स्‍पीक एशिया अकाउंट में। यानी उसे निकालने के लिए आपको टीडीएस कटवाना पड़ेगा, जो काफी अधिक रकम होती थी। ऐसे में लोग अपना पैसा नये सदस्‍यों के अकाउंट में ट्रांसफर कर देते और उससे कैश ले लेते। जिन लोगों ने अकलमंदी दिखाते हुए यह काम किया उनका पैसा तो वसूल हो गया, लेकिन बाकी लाखों लोगों का पैसा कंपनी के खाते में है। 

manojjaiswalpbt@gmail.com

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शुक्रवार

अब मुफ्त में नहीं होगा भूमि अधिग्रहण

at 01:25

मनोज जैसवाल : किसानों की जमीन अधिग्रहण को लेकर मचे बवाल के बीच केंद्र सरकार ने राज्यों को यह साफ कर दिया है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत बनाई जाने वाली सड़कों के लिए अब मुफ्त में भूमि अधिग्रहण नहीं किया जा सकेगा।

राज्य सरकारों को अब अधिग्रहीत भूमि के लिए किसानों को बाजार दर पर मुआवजे का भुगतान करना होगा। इस फैसले का उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मेघालय और झारखंड के लोगों को विशेष लाभ मिलेगा। इन राज्यों में विश्व बैंक के ऋण से इस योजना के तहत ग्रामीण सड़क कार्यक्रम को साकार किया जा रहा है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक पीएमजीएसवाई के तहत अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन का भुगतान बाजार दर पर करना कानूनन अनिवार्य है। इसके बावजूद कई राज्यों में लोक कार्य का हवाला देकर किसानों व दुकानदारों की जमीन मुफ्त में या फिर थोड़ा-बहुत भुगतान करके अधिग्रहीत कर ली जाती है।

चूंकि इस योजना का लाभ गांववासियों को होता है और ग्राम प्रमुख जमीन उपलब्ध कराता है, लिहाजा जमीन मालिकों के लिए खामोश रहना मजबूरी बन जाती है। अब ऐसा नहीं होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि बगैर मुआवजे के अधिग्रहीत जमीन पर योजना के लिए धन का आवंटन रोक दिया जाएगा।

हाल ही में दूसरे चरण की ग्रामीण सड़क योजना के लिए विश्व बैंक ने 1.5 अरब डॉलर का ऋण दिया है। इस ऋण से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, झारखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और मेघालय में पीएमजीएसवाई के तहत सड़कों का निर्माण किया जाएगा। विश्व बैंक ने इस ऋण को केंद्र और राज्यों को संयुक्त रूप से दिया है।

इसे पांच साल में खर्च किया जाना है। इस वर्ष 170.6 करोड़ डॉलर से 24174 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया जाना है। यह योजना उन सड़कों के लिए है, जहां मैदानी क्षेत्रों के गांवों की आबादी एक हजार से कम और पहाड़ी व सूदूर क्षेत्रों के गांवों की आबादी 500 से कम है। 

manojjaiswalpbt@gmail.com 



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मंगलवार

क्या हम आदिम युग में जी रहे हैं?

at 20:46
hunger-factsमनोज जैसवाल : एक अबोध बालिका जो शायद इस जघन्य,क्रूर कर्म बलात्कार के शब्दार्थ को समझती भी नहीं,कोई वहशी,विकृत मानसिकता वाला पापी,कदाचारी उसका जीवन नष्ट कर दे तो क्या होगा उसका भविष्य?,बलात्कार ऐसा निकृष्ट दुष्कर्म,है, जो हैवानियत की पराकाष्ठा है. एक युवती जिसके माता-पिता उसके विवाह के स्वप्न संजो रहे हों,ऑफिस से लौटती कोई लडकी ,विवाहित महिला जो ट्रेन में यात्रा कर रही हो खेतों में काम करती ,पहाड़ों पर लकड़ी या घास काटने जाती महिला ,प्रौढ़ा जो स्वयं को सुरक्षित समझती हो परन्तु इन नराधमों के चंगुल में फंस दुष्टों को हंसने और स्वयं नारी के जीवन को अभिशाप बनाकर घुट घुट कर जीने को विवश कर देता है ? क्या हम आदिम युग में जी रहे हैं?
प्राय पढ़ते हैं कि ५ वर्ष से भी कम की बच्ची को किसी वहशी ऩे अपनी हवस का शिकार बना लिया.कितना लज्जास्पद और घृणित होता है,यह सुनना, पढना या पता चलना कि रक्षक ही भक्षक बन बैठे. शराब के नशे में पिता या पितृवत चाचा,भाई,मामा ,श्वसुर,ज्येष्ठ अपने कलेजे के टुकड़े को ,,अपनी गोदी में खिलाकर अपनी ही बच्ची ,छोटी बहिन,भतीजी,वधु का जीवन बर्बाद करने वाले बन गये.
उनका कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि लाज शर्म तो ऐसे लोगों के शब्दकोश का शब्द है ही नहीं.मारी जाती है पीडिता,जो स्वयं तो शर्मिन्दगी ,समाज की प्रताड़ना झेलती है,समाज में उसका जीना दूभर हो जाता है,यहाँ तक कि उसका पति भी उसका साथ छोड़ देता है उसके ,पालक भी उसको दोषी मानकर उससे किनारा कर लेते हैं.और वो दरिन्दे खिलखिलाते हैं उनके होंसलें और भी बुलंद होते हैं क्योंकि ऐसे मामलों में पीडिता रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराती.रिपोर्ट दर्ज करने पर सर्वप्रथम तो कुछ होने वाला नहीं और यदि कोई सुनवाई हुई भी तो अदालतों में पूछे जाने वाले अंतरतम को भी चीर कर रख देने वाले प्रश्न ? ऐसे प्रश्न जिनका उत्तर भरी अदालत के बीच देने की कल्पना कर ही मुख पर ताला लगा लिया जाता है.जब उसके परिजन ही उसका कोई दोष न होने पर उसे उपेक्षित कर देते हैं तो किससे आशा करे अभागी पीडिता.
समस्या आती है कि बलात्कारी के साथ क्या सलूक हो .आज जो प्रश्न उठ रहा है कि बलात्कारी को दण्डित किया जाना चाहिए या नहीं ? ऐसा नहीं कि समाज के लिए यह कोई नया अपराध का रूप है,कुत्सित प्रवृत्ति युक्त शक्तिशाली ,समर्थ लोगों की इन दुष्कर्मों में संलिप्तता सदा ही रही है,अपने अपमान का बदला लेने के लिए,शत्रु को नीचा दिखाने के लिए तथा अपने को सामर्थ्यवान सिद्ध करने के लिए यह अपराध समाज में सदा रहा है. सामंतों,राजाओं द्वारा किसी भी सुन्दरी को उठवा लेना ,पूरे पूरे खानदान मिट जाना इतना ही नहीं वंशानुगत रूप में ये विवाद चलते रहने आदि की घटनाएँ हम पढ़ते आये हैं.,समय के साथ मूल्यों में गिरावट आती गयी और बलात्कार सदृश अपराध रूपी वि.षबेल का विस्तार बहुत अधिक बढ़ गया..हाँ पूर्व में समाज के मध्य ऐसी घटनाएँ प्रकाश में नहीं आ पाती थी.अब मीडिया की सक्रियता व समाज में आये परिवर्तनों के कारण ऐसी घटनाएँ उजागर हो जाती हैं.(ऐसा नहीं कि सभी केस सामने आते हैं ,आज भी आम परिवारों में ऐसे मामलों पर पर्दा डाल दिया जाता है) मेरा मानना है कि दंड तो इतना भयंकर बलात्कारी को मिलना चाहिए कि वह स्वयं ही त्राहि त्राहि करे..दंड का विधान ऐसा होना चाहिए कि भविष्य में पापियों की आत्मा तक काँप जाए.ऐसी सोच मस्तिष्क में आने से पूर्व.
मानवाधिकारों का जहाँ तक प्रश्न है,इनके हनन की दुहाई देने वाले यह भूल जाते हैं,जो अपराधी इस कुत्सित प्रवृत्ति का आदि हो चुका है,वो कभी नहीं सुधरने वाला.उसके साथ कैसी मानवता ? कैसी दया?ऐसे अपराधी को बार बार अवसर दिया जाना मानवाधिकारों का हनन है,उन अभागी बहिनों,बच्चियों,के मानवाधिकारों का जिनके लिए दुर्लभ मानवजीवन अभिशाप बन जाता है.जिनमें से न जाने कितनी बहिनें अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर देती हैं.
उपरोक्त संदर्भ में ध्यान देने योग्य बात यही है कि ऐसे मामलों की तुरंत सुनवाई हो तथा अविलम्ब निष्पक्ष जांच हो और अपराधी को दंड कठोरतम मिले और जन जन तक उस दंड का समाचार पहुंचे.किसी भी सूरत में अपराधी को माफ़ी न मिले और साथ ही समाज को, परिजनों को भी अपनी सोच बदलनी होगी कि उनके द्वारा पहले से दुखी पीडिता के साथ सहानुभूति व प्रेमपूर्ण व्यवहार करें.
एक विशेष बात जो इस आलेख के साथ संलग्न की जानी आवश्यक है वह बहुत महत्पूर्ण है.परिवर्तित समय में आज कुछ केसेज ऐसे भी सामने आते हैं कि चर्चित होने के लिए या कुछ विशेष लाभ आदि प्राप्त करने के लिए या फिर किसी से बदला लेने के लिए नारी पुरुष पर ऐसे मिथ्या आरोप लगा देती हैं.ऐसे मामलों की विशिष्ठ निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि गलती नारी की है तो उसको भी दण्डित किया जाना चाहिए 
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बुधवार

अब यूपी से माया सरकार को निकालकर दिखाऊंगाः राहुल गांधी

at 23:16
मायावती को ललकार कर राहुल का मिशन 2012 शुरुमनोज जैसवाल :वाराणसी ।। उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन तलाशने में बेसब्री से जुटी कांग्रेस भट्टा पारसौल की घटना को राज्य के कोने-कोने में ले जाने और इसके सहारे मुख्यमंत्री मायावती को सत्ता से उखाड़ फेंकने की तैयारी में जुट गई है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने वाराणसी में बुधवार से आरम्भ हुए पार्टी के दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन में यह साफ कर दिया।

अधिवेशन में आए कार्यकर्ताओं और नेताओं को सम्बोधित करते हुए राहुल ने कहा कि उन्होंने भट्टा पारसौल से तो उत्तर प्रदेश की लड़ाई शुरू की है, वह यहीं रुकने वाले नहीं हैं बल्कि उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में इस लड़ाई को ले जाएंगे। उन्होंने कहा, 'मैं प्रदेश के कोने-कोने में जाऊंगा और सरकार के खिलाफ लड़ूंगा। इस सरकार को निकाल फेंका जाएगा।

मुख्यमंत्री मायावती पर निशाना साधते हुए राहुल ने कहा, 'मायावती दावा करती हैं कि भट्टा पारसौल में सब ठीक-ठाक है, लेकिन मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि वहां सब कुछ ठीक है तो लोग वहां से भाग क्यों रहे हैं, क्यों वहां धारा 144 अभी तक लगा हुआ है।'

उन्होंने कहा, ''क्यों राज्य सरकार भट्टा पारसौल की घटना की न्यायिक जांच नहीं करवा रही है ? यदि इसकी निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच हो जाए तभी पता चल सकेगा कि वहां क्या हुआ था।'

कांग्रेस महासचिव ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश सरकार को निकालकर दिखाएंगे। ''प्रदेश में पिछले 20 वर्षों में जनता ने विभिन्न सरकारों को देखा, लेकिन विकास की सरकार नहीं देखी। केंद्र सरकार की तरफ से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत मुहैया कराए जाने वाले धन को लेकर प्रदेश की मुख्यमंत्री का कहना है कि उन्हें इसकी जरूरत नहीं है। जबकि दुनिया भर में इस कार्यक्रम की सराहना हो रही है।' उन्होंने कहा, ''दुनिया जिस रफ्तार से चल रही है हम चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश भी उसी तेजी से विकास करे। मैं प्रदेश के भविष्य के लिए लड़ूंगा और कोने-कोने में पहुंचकर लडूंगा। हमारी लड़ाई सिर्फ चुनावी लड़ाई नहीं है। हम प्रदेश को बदलना चाहते हैं।'
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शनिवार

देशी नुस्खा जो मंहगी दवाओं से कई कदम आगे है

at 22:24
मनोज जैसवाल : खांसी की समस्या एक आम समस्या है। हर कोई अपनी जिंदगी में कई बार खांसी समस्या से परेशान होता है। बुखार से तो फिर भी इंसान हिम्मत के दम पर झूझता रह सकता है लेकिन सर्दी-खांसी से व्यक्ति इतना बेहाल हो जाता है कि वह किसी काम को करने के लायक ही नहीं बचता। वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित ऐलापैथिक चिकित्सा पद्धति में खांसी को भगाने के लिये ढेरों-ढेर दवाइयां मौजूद हैं लेकिन जानकारों की माने तो ये दवाइयां खांसी को तो रोक देती हैं किन्तु दूसरी कई अन्य समस्याओं को पैदा कर सकती है। इसीलिये यहां हम लाएं हैं आयुर्वेद से खोज कर एक ऐसा प्रयोग लाएं हैं जो बेहद आसान होते हुए भी 100 फीसदी कारगर है....

काली मिर्च का पाउडर मुनक्का दाख के साथ लपेट लें। काली मिर्च से लिपटी हुईं मुनक्का दाखों को तवे पर थोड़े से शुद्ध देसी घी के साथ हल्की आंच पर सेक लें। पर्याप्त सिकी हुई मुनक्का को दो-दो की संख्या में मुंह में रखकर चूंसते रहें। आप देखेंगे कि कुछ ही घंटों में आपकी खांसी जड़ से मिट चुकी है। 
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बुधवार

9/11 : फिल्मों का बिकाऊ सब्जेक्ट

at 22:39
मनोज जैसवाल॥ नई दिल्ली

अमेरिका पर हुए 9/11 अटैक को लेकर फिल्में बनाने में हॉलिवुड ही नहीं, बॉलिवुड भी पीछे नहीं रहा। बॉलिवुड को 9/11 हमले की पहली बार याद घटना के तीन साल बाद आई थी। बिपाशा बसु और जॉन अब्राहम को लीड रोल में लेकर मदहोशी टाइटिल से फिल्म बना रहे डायरेक्टर तनवीर खान ने शूटिंग के दौरान जून 2003 में स्क्रिप्ट में थोड़ा बदलाव करने के बाद वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले को अपनी स्क्रिप्ट का हिस्सा बनाया। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म जब टिक नहीं पाई तो निर्माताओं ने इस घटना को भुला दिया।

लंबे अरसे बाद करण जौहर जैसे टॉप फिल्म मेकर को एकबार फिर 9/11 याद आया और बॉक्स ऑफिस पर बिकाऊ स्टार्स को लेकर इस टॉपिक पर 'कुर्बान' और बाद में 'माई नेम इज खान' बना डाली। सैफ अली खान, करीना कपूर, शाहरुख खान, काजोल की इन फिल्मों की कहानी सीधे तौर से 9/11 की घटना के साथ जोड़ी गई। माई नेम... को विदेशी बॉक्स ऑफिस पर जबर्दस्त कामयाबी मिली।

इसी दौरान यश चोपड़ा जैसे नामी बैनर ने नील नितिन मुकेश, जॉन अब्राहम और कैटरीना कैफ के साथ 'न्यू यॉर्क' बनाई। इस फिल्म में अमेरिकी खुफिया संगठनों द्वारा एक खास समुदाय के लोगों को इस घटना के बाद प्रताडि़त किए जाने का मुद्दा असरदार ढंग से उठाया गया।

बॉलिवुड में 9/11 पर अब तक छोटे-बड़़े बैनर की लगभग बारह फिल्में बनी हैं। इनमें वर्ल्ड टे्रड सेंटर पर हुए हमले और यूरोपीय देशों में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे भेदभाव से खास संप्रदाय में पनपते गुस्से को उजागर किया गया। ऐसा नहीं है कि इस सब्जेक्ट पर सिर्फ नामी बैनर ने मेगा बजट फिल्में बनाईं। एक्टर नसीरुद्दीन शाह ने बतौर डायरेक्टर अपनी पहली फिल्म 'ये होता तो क्या होता' में भी 9/11 की घटना को अलग अंदाज में पेश किया। इस घटना पर आतंकवादी और बंधक टाइटिल से फिल्में बनाई गईं, लेकिन इन फिल्मों को सिनेमा और दर्शक नसीब नहीं हुए।

पाकिस्तान के एक प्रोड्यूसर , डायरेक्टर शोएब मंसूर ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद वहां एक संप्रदाय विशेष को शक की नजर से देखने और उनके अंदर भड़कती आग को अपनी फिल्म ' खुदा के लिए ' में पेश किया। ' तेरे बिन लादेन ' फिल्म में ओसामा को मजाकिया ढंग से दिखाया गया।



लादेन पर बनेगी हॉलिवुड फिल्म

आईएएनएस ॥ वॉशिंगटन : ओसामा बिन लादेन की खोज और मौत के अमेरिकी अभियान पर हॉलिवुड में जल्द ही एक फिल्म बनने जा रही है। यह फिल्म कोई और नहीं बल्कि अपनी पहली ही फिल्म से ऑस्कर जीतने वाली कैथरीन बगेलो बना रही हैं। शूटिंग इन्हीं गर्मियों में शुरू होने की उम्मीद है। वैसे तो लादेन के किस्से पर वह और फेमस स्क्रिप्ट राइटर मार्क बोएल पिछले साल से ही काम कर रहे हैं। पर अब यह लगभग पूरी हो गई है। इससे पहले बोएल और कैथरीन 2008 में आई ऑस्कर विजेता फिल्म ' हर्ट लॉकर ' में साथ काम कर चुके हैं। यह फिल्म इराक में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई पर आधारित 
है । 
मनोज्जैस्वल्प्ब्त@जीमेल.com 
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सोमवार

दहशत के पर्याय लादेन और हिटलर दोनों की मौत 1 मई को

at 18:12
मनोज जैसवाल :इसे महज संयोग कहें या नियति दो इंसान जिन्होंने आतंक और खौफ का पर्याय कहा जाता था उन दोनों का खात्मा एक ही दिन हुआ। हम बात कर रहे हैं बीते जमाने के उस व्यक्ति की जिसने यूरोप को बुरी तरह से नेस्तेताबूत कर दिया था।

जीं हां यहां बात हो रही है जर्मनी के तानाशाह अडोल्फ हिटलर की जिसने दूसरे विश्वयुद्ध में यूरोप को बुरी तरह बर्बाद कर दिया था। उसकी मौत 1 मई 1945 को हुई थी। गौरतलब है कि दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार के बाद तानाशाह हिटलर ने खुदकुशी कर ली थी। हिटलर के मारे जाने की खबर 1 मई 1945 को आई थी। कहा जाता है कि हिटलर ने 30 अप्रैल 1945 को खुदकुशी कर ली थी। लेकिन उनकी मौत की तारीख को 1 मई ही माना जाता है।

जबकि मौजूदा समय में विश्व का सबसे बड़ा आतंकी ओसामा बिन लादेन की मौत भी 1 मई को हुई है। गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने घोषणा की थी कि रविवार रात अमेरिकी सेना के हमले मे ओसामा बिन लादेन मारा जा चुका है। ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 90 किलोमीटर दूर अमेरिका सेना ने मार गिराया।

जानकारी के मुताबिक लादेन इस घर में पिछले साल अगस्त से छुपा हुआ था। 40 मिनट तक चले इस ऑपरेशन में लादेन के परिवार वालों और मुख्य सहयोगी अल जवाहिरी के मारे जाने की भी खबर है। हालांकि जवाहिरी की मौत की पुष्टि नहीं हुई है। इस ऑपरेशन में अमेरिकी सेना को जान का नुकसान नहीं पहुंचा है।

एक तरफ ओसामा की मौत की खबर पूरी दुनिया की मीडिया की सुर्खियों में हैं वहीं अभी तक पाकिस्तान के किसी भी सरकारी अधिकारी की तरफ से ओसामा की मौत के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। ना पाकिस्तानी के प्रधानमंत्री, ना राष्ट्रपति और ना ही अन्य किसी सरकारी अधिकारी ने ओसामा की मौत के बाद कोई बयान दिया है। बात साफ है पाकिस्तान में कि ओसामा की मौत से पाकिस्तान वाकई सदमे में होगा और अब उसे अमेरिका के सामने जवाब देना वाकई भारी पड़ेगा।
manojjaiswalpbt@gmail.com
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शनिवार

समिति में शामिल हो दलित सदस्य : माया

at 01:08
मनोज जैसवाल-नई दिल्ली ।। यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने करप्शन के खिलाफ अन्ना हजारे की मुहिम का स्वागत तो किया, लेकिन लोकपाल बिल मसौदा समिति में दलितों की अनुपस्थिति पर नाखुशी भी जताई। मायावती ने मांग की कि संयुक्त समिति का पुनर्गठन कर किसी गैर राजनीतिक अनुसूचित जाति के व्यक्ति को उसमें शामिल किया जाए।

समिति में शामिल शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर सवाल उठने का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा कि कमिटी को ऐसे लोगों से खुद को अलग कर लेना चाहिए , जिनकी ईमानदारी पर सवाल उठे हों। मायावती ने कहा कि अन्ना हजारे शायद यह भूल गए कि वह जिस महाराष्ट्र राज्य के रहने वाले हैं संविधान निर्माता डॉ . भीमराव आंबेडकर भी वहीं के थे। मुख्यमंत्री ने अन्ना हजारे और सिविल सोसायटी के सदस्यों व अन्य संगठनों द्वारा देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाए जाने के लिए सराहना करते हुए कहा कि बीएसपी भी भ्रष्टाचार और राजनीति में अपराधीकरण के विरुद्ध शुरू से ही आवाज उठाती रही है।

कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह द्वारा अन्ना हजारे को उत्तर प्रदेश में जाकर आंदोलन करने की चुनौती के बीच उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि मैं अन्ना हजारे एवं उन सभी संगठनों का स्वागत करती हूं जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। दिग्विजय को जवाब देते हुए मायावती ने कहा है कि उनकी सरकार को भ्रष्टाचार विरासत में मिला है।
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गुरुवार

भारतीय बैंकों में भी ब्लैक मनी?

at 02:05
मनोज जैसवाल- ॥ नई दिल्ली
यह जानकार हैरानी होगी कि इंडियन बैंकों में ऐसे अरबों रुपये पड़े हैं जिन पर किसी ने दावा नहीं किया है। ये कई सालों से बिना किसी दावे के बैंकों में जमा हैं। एक आरटीआई के जवाब में इसका खुलासा हुआ है।

आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने इस संबंध में आरटीआई अर्जी डाली थी , जिसके जवाब में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बताया कि भारतीय बैंकों में 13 अरब से ज्यादा ऐसे रुपये हैं जिन पर किसी ने दावा नहीं किया और ये 10 साल पुराने हैं। 31 दिसंबर 2009 को बैंकों में इस तरह के 13,60, 31,59,646.89 रुपये अनक्लेम्ड हैं। इसमें फॉरेन बैंकों में 473167698 रुपये और दूसरे प्राइवेट बैंकों में 150323106 रुपये हैं। बाकी के पब्लिक सेक्टर के बैंकों में हैं। आवेदन के जवाब में कहा गया कि ऐसी कोई स्कीम नहीं है जिसके तहत बैंकों में पड़ी ऐसी रकम को , जिस पर कोई दावा न करें , एक निश्चित समय के बाद सरकारी अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाए।

आरबीआई के मुताबिक , स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में 1047223 अकाउंट में 881584887 रुपये , स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर ऐंड जयपुर में 75261 अकाउंट में 144361403 रुपये , स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद में 86311 अकाउंट में 85966644 रुपये , स्टेट बैंक ऑफ इंदौर में 40114 अकाउंट में 88583351 रुपये , स्टेट बैंक ऑफ मैसूर में 122628 अकाउंट में 300340111 रुपये , स्टेट बैंक ऑफ पटियाला में 532 अकाउंट में 3513378 रुपये , एचडीएफसी बैंक में 2500 अकाउंट में 18994831 रुपये , आईसीआईसीआई बैंक में 90094 अकाउंट में 281925887 रुपये पड़े हैं जिन पर 10 सालों से किसी ने दावा नहीं किया है।
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रविवार

सोनिया को न्यौता देने पहुंचे वरुण

at 02:58
मनोज जैसवाल-नई दिल्ली।

Story Update : मनोज जैसवाल 

सियासी मोर्चे पर दो ध्रुवों में बंटा गांधी परिवार व्यक्तिगत रिश्तों कीमिठास लंबे अर्से बाद एक बार फिर साझा कर सकता है। वरुण गांधी ने पहल करते हुए बुधवार को अपनी शादी का न्यौता ताई सोनिया गांधी को दिया है। प्रियंका गांधी की शादी के 14 साल बाद यह पहला अवसर है जब गांधी परिवार में शादी होने जा रही है।

शादी में पहुंचकर आशीर्वाद देने का किया आग्रह
भाजपा सांसद वरुण गांधी अपनी शादी का न्यौता देने बुधवार को दिन में अपनी ताई और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निवास दस जनपथ पर पहुंचे। वरुण अपनी ताई के घर लगभग एक घंटे रुके और इस दौरान शादी की तैयारी, लड़की और उसके परिवार आदि को लेकर चर्चा हुई। वरुण से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी स्नेहपूर्वक मिलीं और उन्होंने वरुण को बधाई दी। वरुण ने उनसे अपनी शादी में उपस्थित होने का आग्रह किया और सोनिया ने भी हामी भरी। इसके बाद सोनिया ने वरुण का मुंह मीठा कराया और कुछ अन्य पारिवारिक मुद्दों पर बातचीत के बाद वरुण गांधी लौट आए।

वरुण ने इस मुलाकात को लेकर कोई भी जानकारी देने से यह कहते हुए मना किया है कि यह व्यक्तिगत और पारिवारिक मुलाकात थी। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी ताई होने के नाते उनके परिवार की सदस्य हैं और उन्हें शादी का न्यौता देने गया था। वरुण लगभग एक साल बाद सोनिया गांधी से मिलने उनके घर पहुंचे थे। उम्मीद है कि 6 मार्च को वाराणसी में वरुण की शादी में सोनिया मौजूद रहेंगी। यदि ऐसा होता है तो 14 साल बाद गांधी परिवार एक जगह एक साथ मौजूद होगा। इससे पहले 1997 में प्रियंका गांधी की शादी में दोनों परिवार एक जगह जुटे थे।

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बुधवार

फिक्सिंग का साया: भारत-इंग्‍लैंड मैच की वॉर्न ने कैसे की सही भविष्यवाणी?

at 23:36
मनोज जैसवाल -नई दिल्ली. विश्व कप में विवादों का सिलसिला थम नहीं रहा है। भारत और इंग्लैंड के बीच रविवार को टाई हुए मैच को लेकर यूडीआरएस के बाद एक और बड़ा विवाद खड़ा होता दिख रहा है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) के अध्यक्ष एजाज बट ने भारत और इंग्लैंड के बीच विश्व कप के ग्रुप 'बी' के तहत रविवार को खेले गए मैच के टाई होने की ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर शेन वॉर्न की भविष्यवाणी की जांच किए जाने की मांग की है। वॉर्न ने मैच शुरू होने से पहले सोशल माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट 'ट्विटर' पर मैच के टाई होने की भविष्यवाणी की थी। अपने संदेश में वॉर्न ने लिखा था, 'भारत और इंग्लैंड के बीच मैच को लेकर उत्साहित हूं। आज रोमांचक मैच होना चाहिए। मेरी भविष्यवाणी है कि मैच टाई होगा।'

गौरतलब है कि बीते रविवार को भारत के 338 रनों के जवाब में इंग्लैंड ने आठ विकेट खोकर 338 रन बनाए थे। भारत और इंग्लैंड के बीच मैच खत्म होने के बाद वॉर्न ट्विटर पर फिर नमूदार हुए थे और लिखा था, '7/8 घंटे पहले लगाया गया मेरा अंदाजा सही निकला, मुझे भरोसा नहीं हो रहा है। सोचा नहीं था कि ऐसा होगा, लेकिन बुरा नहीं रहा।' पाकिस्तान के टीवी चैनल जियो न्यूज़ ने बट के हवाले से खबर दी है कि बट मुंबई में होने वाली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की बैठक में वे इस मसले को उठाएंगे। बट ने वॉर्न की भविष्यवाणी पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि इस मामले की कड़ाई से जांच होनी चाहिए। गौरतलब है कि पाकिस्तान के तीन क्रिकेटरों के मैच फिक्सिंग में दोषी पाए जाने के बाद आलोचनाओं से घिरे रहे एजाज बट ने इंग्लैंड के खिलाड़ियों पर भी मैच फिक्सिंग में शामिल होने का आरोप लगाया था। गौरतलब है कि पाकिस्तान के तीन क्रिकेटरों-सलमान बट, मोहम्मद आमिर और मोहम्मद आसिफ पर इंग्लैंड के खिलाफ पिछले साल लॉर्ड्स टेस्ट के दौरान पैसे लेकर नो बॉल फेंकने का आरोप लगा था, जिसे आईसीसी ने सही पाया था। इस मामले में एजाज बट की कुर्सी जाते-जाते बची थी।

पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने भी जताया शक
भारत और इंग्लैंड के बीच विश्व कप मैच के नतीजे की सटीक भविष्यवाणी करने वाले पूर्व ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज शेन वॉर्न पर एजाज बट के अलावा पाकिस्तानी क्रिकेटर भी सवाल उठा रहे हैं। पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज सरफराज नवाज ने कहा, 'कोई मैच में जीत और हार की बात कहे तो समझ में आता है, लेकिन जब एकाएक कोई मैच के टाई होने की भविष्यवाणी करे तो शक होना लाजमी है। क्रिकेट में मैच का बराबरी पर छूटना कोई आम बात नहीं है। आईसीसी को इसकी जांच करनी चाहिए।' मैच के बाद इंग्लैंड के कप्तान एंड्रयू स्ट्रॉस ने शेन वॉर्न को उनकी सटीक भविष्यवाणी के लिए एक जीनियस करार दिया था। सरफराज नवाज के साथ पाकिस्तान के पूर्व खिलाड़ी आमिर सोहेल ने भी वॉर्न के खिलाफ जांच की मांग की है। सोहेल ने आईसीसी पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा, 'जब बात पाकिस्तान के किसी खिलाड़ी की होती है तो आईसीसी तुरंत एक्शन लेता है, पर जब वॉर्न ने भविष्यवाणी की है तो उसे मजाक में लिया जा रहा है।'

जयवर्द्धने और समरवीरा पर भी उठी ऊंगली
पाकिस्तान और श्रीलंका के बीच हुए विश्व कप के ग्रुप 'ए' के मैच पर मैच फिक्सिंग के आरोप लगने के बाद श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने आपत्ति जाहिर की है। श्रीलंका के स्थानीय टीवी चैनल के दो कमेंटेटरों ने मैच के लाइव टेलीकास्ट के दौरान ही श्रीलंका टीम के पूर्व कप्तान जयवर्द्धने और समरवीरा पर फिक्सिंग के आरोप लगाए थे। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए श्रीलंका बोर्ड संबंधित चैनल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने पर विचार कर रहा है।

राशिद लतीफ को स्पॉट फिक्सिंग का शक
पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर और कप्तान राशिद लतीफ एक बार फिर मैच फिक्सिंग को लेकर अपने बयान से चर्चा में हैं। लतीफ ने ऑस्ट्रेलिया और जिंबाब्वे मैच के दौरान ऑस्ट्रेलियाई टीम के शुरुआती दो ओवरों में महज पांच रन बनाए जाने पर शक जताते हुए कहा है कि विश्व कप के लीग मैचों में स्पॉट फिक्सिंग की काफी गुंजाइश है।

आईसीसी ने कहा-सुबूत पेश करो या चुप रहो
आईसीसी ने राशिद लतीफ के बयान पर आपत्ति जाहिर करते हुए कहा है कि बिना किसी सुबूत के सिर्फ आरोप लगाना सही नहीं है। आईसीसी के सीईओ हारून लॉर्गट ने एक समाचार चैनल से बातचीत में कहा कि ऑस्ट्रेलिया-जिंबाब्वे मैच में स्पॉट फिक्सिंग का आरोप बेबुनियाद है। वहीं, लॉर्गट ने लतीफ के बयान को बकवास करार देते हुए कहा कि बिना किसी सुबूत के ऐसे आरोप लगाना सही नहीं है।

ऑस्ट्रेलिया का इनकार
ऑस्ट्रेलियाई टीम ने इस बात का खंडन किया है कि शेन वॉटसन और ब्रेड हैडिन के खिलाफ आईसीसी स्पॉट फिक्सिंग की जांच कर रही है। गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया के ओपनरों पर जिंबाब्वे के खिलाफ मैच में धीमी शुरुआत करने पर राशिद लतीफ ने ऊंगली उठाई थी। ऑस्ट्रेलियाई टीम मैनेजर स्टीव बर्नार्ड ने कहा, 'ये अबतक की सबसे बेवकूफी भरी खबर है जो मैं सुन रहा हूं। मैं जब से भारत आया हूं, ऐसी ऊट-पटांग खबरों से जूझ रहा हूं। इससे पहले इन्होंने कप्तान पोंटिंग पर बल्ले से टीवी फोड़ने का आरोप लगाया था, जो सरासर गलत है। टीवी फूटा नहीं था उसे बस हल्का सा झटका लगा था।'

बर्नार्ड ने कहा, 'मैंने अपने क्रिकेट करियर में ये नहीं सुना कि किन्हीं दो खिलाड़ियों पर इसलिए जांच हो रही है क्योंकि उन्होंने पहले दो ओवरों में महज पांच रन बनाए। वो फ्रेश पिच थी और उसे समझने में खिलाड़ियों ने थोड़ा सा समय लिया बस। इससे अधिक और कुछ भी नहीं था। हमने 260 के करीब स्कोर बनाया था जो उस पिच पर बहुत अच्छा था।'

आपकी राय
क्या विश्व कप में मैच या स्पॉट फिक्सिंग की गुंजाइश है? क्या शेन वॉर्न की भविष्यवाणी को गंभीरता से लेना चाहिए? क्या पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड विश्व कप की मेजबानी न मिलने और खुद के खिलाड़ियों के स्पॉट फिक्सिंग में फंसने के बाद दूसरे देशों और खिलाड़ियों को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है? क्या आईसीसी को और ज़्यादा चुस्त-दुरुस्त होना चाहिए? इन सवालों को लेकर आप अपनी राय मर्यादित भाषा में जाहिर कर सकते हैं। राय देने के लिए नीचे बॉक्स में क्लिक करें।
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शुक्रवार

रेल बजट 2011: खास-खास बातें

at 14:00
मनोज जैसवाल-नई दिल्ली।। रेल मंत्री ममता बनर्जी संसद में इस समय रेल बजट पेश कर रही हैं। रेल यात्रियों के लिए अपनी झोली से क्या-क्या निकाल रही हैं ' दीदी ' , आइए आपको बताते हैं...


स्मार्ट कार्ड टिकटः गो इंडिया नाम से स्मार्ट कार्ड टिकट प्रोजेक्ट लॉन्च किया जाएगा

तीन नई शताब्दीः पुणे-सिकंदराबाद, जयपुर-आगरा, लुधियाना-दिल्ली के बीच 3 नई शताब्दी ट्रेनें

नई दुरंतो ट्रेनें: इलाहाबाद-मुंबई, पुणे-अहमदाबाद, सियालदाह-पुरी, मदुरै-चेन्नै, चेन्नै-तिरुअनंतपुरम और मुंबई सेंट्रल-नई दिल्ली के बीच नई दुरंतो ट्रेनें

विवेकानंद और टैगौर के नाम पर ट्रेनः विवेकानंद के नाम पर विवेक एक्सप्रेस, रविंद्रनाथ टैगोर के नाम पर कवि गुरु एक्सप्रेस चलेगी

राज्य राजधानीः राज्यों की राजधानी को जोड़ने के लिए नई राज्य राजधानियां चलेंगी

नई ट्रेनें: 56 नई एक्सप्रेस गाड़ियां, 22 नई डीएमयू

नई ट्रेनें: हरिद्वार: रामनगर लिंक एक्सप्रेस, जन्मभूमि गौरव एक्सप्रेस

दिल्ली के लिए डबल डेकरः जयपुर-दिल्ली, अहमदाबाद-मुंबई के बीच डबल डेकर ट्रेनें चलेंगीं

नई ट्रेनें: सहरसा-पटना इंटरसिटी एक्सप्रेस

नई ट्रेनें : जयपुर-आगरा, लुधियाना-दिल्ली के बीच शताब्दी

सीनियर सिटिजन्सः सीनियर सिटीजन्स के लिए छूट। महिलाओं के लिए उम्र की सीमा 62 से 58 की गई।

विकलांगों के लिए छूटः राजधानी में विकलांगों को छूट मिलेगी।

ममता के 'बंगाल प्रेम' पर संसद में हंगामाः लालू ने ममता पर बजट में बंगाल प्रेम का आरोप लगाया, तो ममता बनर्जी ने झल्लाकर कहा, 'आप ने भी तो बिहार के लिए ऐसा ही किया है।'


फेरे बढ़ेः 17 ट्रेनों के फेरे बढ़ाए गए

कोलकाता को फायदाः कोलकाता मेट्रो रेलवे का 17वां जोन बना। कोलकाता मेट्रो का दायरा भी बढ़ेगा

कमाई बढ़ीः रेलवे की कमाई में भारीत बढ़ोतरी, लेकिन छठे वेतन आयोग से भार बढ़ा

रेलकर्मियों के लिए तोहफाः रेलवे कर्मचारियों के बच्चों को स्कॉलरशिप मिलेगी

पूर्व सैनिकों के लिए तोहफाः 16,000 पूर्व सैनिकों की रेलवे में भर्ती की जाएगी

रेलवे में अब नई क्लासः नए सुपर एसी क्लास का ऐलान

नॉन एसी टिकट बुकिंग सस्तीः ऑनलाइन नॉन एसी टिकट बुकिंग 5 रुपये में

एसी टिकट बुकिंग सस्तीः ऑनलाइन एसी टिकट बुकिंग अब 20 रुपये के बजाय 10 रुपये

रेल न रोकी तो इनामः रेल नहीं रोकने पर दो नई ट्रेन का तोहफा मिलेगा

लैंड डाटा तैयारः रेलवे ने अपना लैंड डाटा तैयार कर लिया है

रेलवे सुरक्षाः ऑल इंडिया सिक्यूरिटी हेल्पलाइन सेवा

रेलवे सुरक्षाः तीन रेलवे जोन में टक्कररोधी उपकरण लगाए जाएंगे

नई रेल लाइनः बस्तर-गढ़चिरौली के बीच रेल लाइन

2010-11 में रेलवे की विकास दर 8.6% रही

नक्सली इलाके में रेल नेटवर्क बढ़ेगा

महाराष्ट्र में रेलवे का गैस पावर प्लांट लगेगा

कोलकाता में मेट्रो कोच फैक्ट्री

प्रधानमंत्री रेल विकास योजना का एलान

मणिपुर में डीजल लोकोमोटिव फैक्ट्री लगाई जाएगी

जम्मू में टनल इंजिनियरिंग की फैक्ट्री बनाई जाएगी

700 किलोमीटर नई पटरी बिछाई जाएगी

बोंगई गांव, नंदीग्राम में औद्योगिक पार्क बनेगा

दार्जिलिंग में रेलवे सॉफ्टवेयर सेंटर बनाएगा

इंफाल को रेलवे नेटवर्क से जोड़ा जाएगा

सिंगूर और उड़ीसा में मेट्रो कोच फैक्ट्री बनेगी

ममताः तीन महीने में रायबरेली फैक्ट्री में उत्पादन चालू हो जाएगा।

ममतः रेलवे विजन 2020 पर काम कर रही है

ममता ने इस शेर से की अपने बजट भाषण की शुरुआत- हम चर्चा भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वह खून भी करते हैं चर्चा नहीं होती।

@12.03 pm

लोकसभा में काले धन पर विपक्षी संसद के भारी हंगामे के बीच 2010-11 का आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया।
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हर प्रोन्नति के लिए एक शोध ?

at 23:34
 मनोज जैसवाल-देश की समस्त भाषाओं को मिलाकर जनसंख्या का लगभग चालीस प्रतिशत हिस्सा भी शिक्षित नहीं है और इसमें से दस प्रतिशत आबादी भी लेखक नहीं है। लेकिन विचित्र है कि शिक्षकों की आबादी का बड़ा हिस्सा आज लेखक बनता जा रहा है। और ऐसी स्थिति देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियम के अनुसार, यदि असिस्टेंट प्रोफेसर को एसोशिएट प्रोफेसर और एसोशिएट प्रोफेसर को प्रोफेसर बनना है, तो इसके लिए शोध प्रबंध तैयार करना जरूरी है। यानी हर प्रोन्नति के लिए एक शोध। और किसी को यह तथ्य बताने की जरूरत नहीं कि यही शोध पत्र किताबों की शक्ल लेते जाते हैं।
ऐसे में, जो लिख नहीं सकते, वे लेखक हैं। प्रायः हर दूसरी किताब पूर्वप्रकाशित अन्य लेखकों की किताबों के संशोधित संस्करण हैं। इनमें से पचास फीसदी किताबें तो पीएचडी थीसिस की अविकल प्रस्तुति हैं और उनचास फीसदी पहले छपी दस किताबों के आधार पर तैयार की गई एक और किताब होती है। हिंदी प्रदेश में फरजी शोध के आधार पर बड़े ओहदों पर पहुंचने और जांच के बाद असलियत सामने आने की बात कोई नई नहीं है। कुछ ही किताबें उन लेखकों द्वारा लिखी गई हैं, जो प्रोफेसर न होते हुए भी लिखते हैं। यानी ये किताबें प्रोन्नति के लिए रातोंरात लिखी जाने के बजाय गहन साधना और अध्यवसाय से लिखी गई हैं, और इसीलिए ये अधिकृत और प्रामाणिक हैं। लेकिन भ्रामक किताबों की भीड़ में इनकी शिनाख्त वही कर सकता है, जिसे विषय की ठीक-ठाक और गहरी समझ हो।
सबसे दयनीय और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति मंच कला पर लिखी पुस्तकों की है। अव्वल तो मंच और प्रदर्शनकारी कलाओं के शिक्षकों के लिए प्रोन्नति का यह पैमाना होना ही नहीं चाहिए। शंभू मित्र या ओम शिवपुरी जैसे कलाकारों और बड़े गुलाम अली खां और बेगम अख्तर जैसे कंठशिल्पियों की प्रसिद्धि का आधार उनकी किताबें नहीं हैं। फिर इस क्षेत्र में प्रसिद्धि या प्रोन्नति का आधार लिखी गई पुस्तक क्यों हो? लेकिन यहां तो शास्त्रीय संगीत जैसे गंभीर विषय पर भी अगंभीर पुस्तकों की बहुतायत है। ऐसी ही एक किताब हाल में प्रकाशित हुई है, जिसमें बताया गया है कि हरि महाराज के बेटे और कूटताल के विशेषज्ञ पंडित किशन महाराज का 1966 में निधन हो गया। जबकि पंडित किशन महाराज का देहावसान पांच अप्रैल, 2008 को हुआ। उनकी नजरों से भी यह किताब गुजरी थी।
विद्रूप देखिए कि इस पुस्तक की भूमिका सरोद शिल्पी उस्ताद अमजद अली खां से लिखवाई गई! यह प्रोन्नति का ही तकाजा है कि जिन्होंने कभी पढ़ाई में रुचि नहीं ली और संगीत साधना करते रहे, वे अब प्रोफेसर पद के अगले साक्षात्कार से पहले किताब के नाम पर कुछ भी लिखने की साधना कर रहे हैं। नतीजतन विश्वविद्यालयों में हर संगीत शिक्षक लेखक है, भले ही लिखने का सुर और सम अगले जन्म में लगे। विडंबना यह भी है कि गलत सूचनाएं देती ऐसी किताबों पर संगीत समीक्षकों और संगीत सचेतकों का भी ध्यान नहीं है। यानी शास्त्रीय संगीत आज भी शिक्षितों के बहुसंख्य अभिजात्य वर्ग के लिए एक अजूबा है, बेशक इसे समझने का दावा हर कोई करता है। यह स्थिति इस ओर भी इशारा करती है कि शास्त्रीय संगीत के अधिकारी समीक्षक आज कितने कम होते गए हैं। इसी से इस क्षेत्र में भेड़ियाधसान की यह स्थिति बनी है।
ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि बड़े स्तर पर पढ़ी-पढ़ाई जा रही इन गलतियों की ओर ध्यान दिलाने का जिम्मा और जोखिम आखिर कौन उठाएगा? पाठकों और विद्यार्थियों के साथ हो रही इस धारावाहिक हिंसा के विरुद्ध उनके पक्ष में पहल कौन करेगा और यह किसकी जिम्मेदारी बनती है? होना तो यह चाहिए कि ऐसी बेसुरी और अज्ञान का प्रसार करने वाली किताबों को शिक्षा परिसरों से बेदखल कर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपनी प्राचीन नियमावलियों पर पुनर्विचार करे और शिक्षक एवं कलाकारों का गंभीर समवाय अच्छी और गंभीर पुस्तकों की एक ऐंथोलॉजी तैयार करे। क्या उम्मीद करें कि सरकार की तरफ से यह जरूरी पहल होगी!
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गुरुवार

कोक और पेप्सी से कैंसर का खतरा

at 15:59
1.jpg  मनोज जैसवाल-वॉशिंगटन।। कोल्ड ड्रिंक्स के हेल्थ पर खराब पर असर को लेकर चर्चा कोई नई बात नहीं है। अब यह बात सामने आ रही हैं कि कोका-कोला और पेप्सी में इस्तेमाल होने वाला तत्व की वजह से कैंसर तक हो सकता है। हेल्थ के क्षेत्र में काम करने वाली पावरफुल लॉबी ने इसे तुरंत बैन करने की मांग की है। 

ब्रिटिश टैब्लॉइड ' डेली मेल ' के मुताबिक, रिसर्चरों का मानना है कि कोल्ड ड्रिंक्स में भूरा रंग लाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कलरिं एजेंट की वजह से हजारों लोगों को कैंसर हो सकता है। वॉशिंगटन डीसी के सेंटर फॉर साइंस इन द पब्लिक इंटरेस्ट (सीएसपीआई) ने कहा, 'कोका-कोला, पेप्सी और बाकी चीजों में इस्तेमाल किए जाने वाले दो केमिकल कैंसर पैदा कर सकते हैं और इन्हें बैन किया जाना चाहिए।'

'कोल्ड ड्रिंक्स और बाकी चीजों में भूरा रंग लाने के लिए चीनी को अमोनिया और सल्फाइट के साथ उच्च दबाव और तापमान पर मिलाया जाता है। इस केमिकल रिऐक्शन में दो तत्व 2-एमआई और 4-एमआई बनते हैं। सरकारी स्टडी यह बात पता चली है कि ये तत्व चूहों के फेफड़े, लीवर और थायरॉइड कैंसर का कारण बने हैं।'

अमेरिका के नैशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम ने कहा है कि इस बात के साफ सबूत हैं कि 2-एमआई और 4-एमआई, दोनों जानवरों में कैंसर पैदा करने वाले तत्व हैं इसलिए आदमियों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

सीएसपीआई के एग्जेक्युटिव डायरेक्टर माइकल जैकबसन ने अमेरिका के फूड रेग्युलेटर के पास इस बारे में कार्रवाई करने के लिए एक याचिका दाखिल की है। उनका कहना है, ' कैंसर पैदा करने वाले तत्वों को खाने में कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए, खासतौर पर तब जब उनका इस्तेमाल केवल रंग के लिए किया जाता हो। ' 

अमेरिकी कानून में रंग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चार तरह के कैरेमल में अंतर किया गया है। इनमें से दो अमोनिया के साथ बनते हैं और दो अमोनिया के बिना। सीएसपीआई अमोनिया के साथ बनने वाले दो कैरेमल पर बैन चाहती है। सीएसपीआई की बात का पांच बड़े कैंसर एक्सपर्ट समर्थन करते हैं।

कोल्ड ड्रिंक्स में इस्तेमाल किया जाने वाला तत्व कैरेमल 4 या अमोनिया सल्फाइट से प्रोसेस कैरेमल के नाम से जाना जाता है। सल्फाइट के बिना केवल अमोनिया के साथ बनाया जाने वाला कैरेमल 3 बियर, सोया सॉस और खाने की कई चीजों में इस्तेमाल किया जाता है।

सीएसपीआई के मुताबिक जांच किए गए कोल्ड ड्रिंक्स में जितना 4एमआई पाया गया है, वह अमेरिका में हजारों लोगों में कैंसर फैला सकता है। सीएसपीआई की बात पर कोका-कोला और पेप्सी ने कुछ भी नहीं कहा है।
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बुधवार

70 साल पुराना वेलेंटाइन कार्ड!

at 17:03
मनोज जैसवाल-लंदन। ब्रिटेन में यह कार्ड आज भी प्यार के इजहार का जरिया बना हुआ है। 70 साल पहले यह कार्ड एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को वेलेंटाइन डे पर दिया था। तब से अब तक हर साल ये दोनों इसी कार्ड से अपने प्यार का इजहार करते आ रहे हैं।
88 साल के हो चुके हैरी वार्ड ने पहली बार 1941 में अपनी प्रेमिका डोरिस को यह कार्ड दिया था। तब वह केवल 17 साल के थे। उस दौरान वह द्वितीय विश्व
 युद्ध की विभीषिका के बीच किसी तरह डोरिस को प्रपोज करने स्टेशन पर पहुंचे थे। तब से अब तक दोनों का साथ कभी नहीं छूटा। अब डोरिस अपने पति हैरी को हर साल यही कार्ड देकर वेलेंटाइन डे मनाती हैं। इस साल भी उन्होंने अपनी वर्षो पुरानी परंपरा निभाई है।
डोरिस ने कहा, हमारे लिए यह कार्ड बहुत अनमोल है। 70 साल से हमने वेलेंटाइन डे पर कोई कार्ड नहीं खरीदा, क्योंकि हमें इसकी जरूरत ही नहीं।
डोरिस और हैरी की शादी 1942 में हुई थी। उनकी दो बेटियां, दो नातिन और 4 परनाती-नातिन हैं। हैरी काफी रोमांटिक हैं और उम्र के इस पड़ाव पर भी अपनी पत्‍‌नी के साथ वेलेंटाइन डे मनाते हैं

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