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सोमवार

श्राद्ध क्या है? आइये जानते है !

at 17:34
View Image in New Windowमनोज जैसवाल : 1. श्राद्ध क्या है?
श्राद्ध प्रथा वैदिक काल के बाद शुरू हुई। और इसके मूल में उपरोक्त श्लोक की भावना है। उचित समय पर शास्त्रसम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मंत्रों के साथ जो (दान-दक्षिणा आदि) दिया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है।
2. श्राद्ध के मुख्य देवता कौन हैं?
वसु, रुद्र तथा आदित्य, ये श्राद्ध के देवता हैं।
3. श्राद्ध किसका किया जाता है? और क्यों?
हर मनुष्य के तीन पूर्वज : पिता, दादा और परदादा क्रमश: वसु, रुद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक्त वे ही सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि समङो जाते हैं। समझ जाता है, कि वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करते हैं। और ठीक ढंग से किए श्राद्ध से तृप्त होकर वे अपने वंशधर के सपरिवार सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का वरदान देते हैं। श्राद्ध के बाद उस दौरान उच्चरित मंत्रों तथा आहुतियों को वे सभी पितरों तक ले जाते हैं।
4. श्राद्ध कितनी तरह के होते हैं?
नित्य, नैमित्तिक और काम्य। नित्य श्राद्ध, श्राद्ध के दिनों में मृतक के निधन की तिथि पर, नैमित्तिक किसी विशेष पारिवारिक मौके (जैसे पुत्र जन्म) पर और काम्य विशेष मनौती के लिए कृत्तिका या रोहिणी नक्षत्र में किया जाता है।
5. श्राद्ध कौन-कौन कर सकता है?
आमतौर पर पुत्र ही अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते पाए जाते हैं। लेकिन शास्त्रनुसार ऐसा हर व्यक्ति जिसने मृतक की संपत्ति विरासत में पाई है, उसका स्नेहवश श्राद्ध कर सकता है। यहाँ तक कि विद्या की विरासत से लाभान्वित होने वाला छात्र भी अपने दिवंगत गुरु का श्राद्ध कर सकता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पौत्र या प्रपौत्र श्राद्ध करते हैं। निस्संतान पत्नी को पति द्वारा, पिता द्वारा पुत्र को और बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिण्ड नहीं दिया जा सकता। किन्तु कम उम्र का ऐसा बच्च, जिसका उपनयन न हुआ हो, पिता को जल देकर नवश्राद्ध कर सकता है। शेष कार्य (पिण्डदान, अग्निहोम) उसकी ओर से कुल पुरोहित करता है।
6. श्राद्ध के लिए उचित और वजिर्त पदार्थ क्या हैं?
श्राद्ध के लिए उचित द्रव्य हैं : तिल, माष, चावल, जों, जल, मूल (जड़युक्त सब्जी) और फल। तीन चीजें शुद्धि कारक हैं : पुत्री का पुत्र, तिल और नेपाली कम्बल! श्राद्ध करने में तीन बातें प्रशंसनीय हैं : सफाई, क्रोधहीनता और चैन (त्वरा (शीघ्रता) का न होना)। श्राद्ध में अत्यन्त महत्वपूर्ण बातें हैं : अपरान्ह का समय, कुशा, श्राद्धस्थली की स्वच्छता, उदारता से भोजनादि की व्यवस्था और अच्छे ब्राह्मणों की उपस्थिति।
कुछ अन्न और खाद्य पदार्थ जो श्राद्ध में नहीं लगते, इस प्रकार हैं : मसूर, राजमा, कोदों, चना, कपित्थ, अलसी (तीसी, सन, बासी भोजन और समुद्र जल से बना नमक। भैंस, हरिणी, ऊँटनी, भेड़ और एक खुर वाले पशुओं का दूध भी वजिर्त है। पर भैंस का घी वजिर्त नहीं। श्राद्ध में दूध, दही और घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने गए हैं।
7. श्राद्ध में कुश तथा तिल का क्या महत्व है?
दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना गया है। माना यह भी जाता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा-विष्णु-महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं। माना गया है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाए, तो दुष्टात्माएँ हवि उठा ले जाती हैं।
8. दरिद्र व्यक्ति श्राद्ध कम खर्चे में कैसे करे?
विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र लोग केवल मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम दक्षिणा, वह भी न हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को दे दें। या किसी गाय को दिनभर घास खिला दें। अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करें कि मैंने हाथ वायु में फैला दिए हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।
9. पिण्ड क्या हैं? उनका अर्थ क्या है?
श्राद्ध के दौरान पके हुए चावल दूध और तिल मिश्रित जो पिण्ड बनाते हैं, उसे सपिण्डीकरण कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है, कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित गुणसूत्र मौजूद होते हैं। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा और परदादा तथा पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलाकर फिर अलग बाँटते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन-जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है। इस पिण्ड को गाय-कौओं को देने से पहले पिण्डदान करने वाला सूँघता भी है। अपने यहां सूँघना यानी आधा भोजन करना माना गया है। इस तरह श्राद्ध करने वाला पिण्डदान के पहले अपने पितरों की उपस्थिति को खुद अपने भीतर भी ग्रहण करता है।
10. इस पूरे अनुष्ठान का अर्थ क्या है?
अपने दिवंगत बुजुर्गो को हम दो तरह से याद करते हैं : स्थूल शरीर के रूप में और भावनात्मक रूप से! स्थूल शरीर तो मरने के बाद अग्नि या जलप्रवाह को भेंट कर देते हैं, इसलिए श्राद्ध करते समय हम पितरों की स्मृति उनके ‘भावना शरीर’ की पूजा करते हैं ताकि वे तृप्त हों, और हमें सपरिवार अपना स्नेहपूर्ण आशीर्वाद दें।

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शुक्रवार

श्रीगणेश की स्थापना कार्य-विधि के सफल होने की निश्चित गारंटी बन जाती है

at 08:33
.मनोज जैसवाल  : प्रथम पूज्य भगवान गणपति का जन्म पर्व गणेश चतुर्थी आज देश भर में मनाई जा रही है। गणेश जी को मनाने के लिए भक्तगण पलक पावडे बिछाए हुए है। इस दौरान मंदिर-मंदिर, घर-घर और द्वार-द्वार पर गणेश जी की पूजा अर्चना की जा रही है। बाजारों में आज सुबह से गुड धाणी, पुजन सामग्री, दूर्वा, फूल माला व डंकों की विशेष खरीदारी हो रही है। विश्व हिन्दू धर्म और संस्कृति को मानने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यह पद रच बस गया है कि कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व मुंह से निकल ही जाता है कि "आइए श्रीगणेश किया जाए"। शिव पार्वती के इस पुत्र की ऎसी क्या महानता है कि उन्हें आद्य-पूजनीय माना जाता है,आज इस बिन्दु पर कुछ विचार किया जाए। पौराणिक कथा है कि माता-पिता के परम भक्त श्रीगणेश थे। एक बार सभी देवगण अपने वाहनों के शक्ति परीक्षण के लिए एकत्र हुए परन्तु गणेशजी असमंजस में थे क्योंकि परीक्षा इस बात की थी कि सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड की परिक्रमा सर्वप्रथम कौन पूरी करेगाक् छोटे से मूषक के साथ यह कैसे संभव होगाक् दौ़ड आरंभ होते ही अति बुद्धिमान गणेशजी ने शिव-पार्वतीजी को प्रणाम कर उन्हीं की प्रदक्षिणा की और प्रतियोगिता में प्रथम आए। उन्होंने इसके पीछे तर्क यह दिया कि माता-पिता मूर्तिमान ब्रम्हाण्ड है तथा उनमें ही सभी तीर्थो का वास है। साथ ही यदि वे माता-पिता स्वयं त्रिपुरारि शिवजी तथा माता-पार्वती हों तो कहना ही क्या है। सम्पूर्ण देव मंडल उनके इस उत्तर पर साधु-साधु कह उठा तथा उन्हें अपने माता-पिता से "सभी पूजाओं/ विधि विधानों में आद्य पूजन" होने का वरदान मिला। यह उनके बुद्धि कौशल के आधार पर अर्जित वरदान था। स्पष्ट है कि श्रीगणेश की पूजा से आरम्भ की गई विधि में कोई बाधा नहीं आती क्योंकि वे अपने बुद्धि-चातुर्य से प्रत्येक बाधा का शमन कर देते हैं। श्रीगणेश की स्थापना कार्य-विधि के सफल होने की निश्चित गारंटी बन जाती है। इस कथा से न केवल गणेशजी के बुद्धि कौशल का परिचय मिलता है, बल्कि उनकी अनन्य मातृ-पितृ भक्ति का भी प्रमाण मिलता है। श्रीगणेश के माहात्म्य को दर्शाने वाली अनेक पौराणिक कथाएं वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। महर्षि वेद-व्यास को जब "महाभारत" की कथा को लिपिबद्ध करने का विचार आया तो आदि देव ब्रम्हाजी ने परम विद्वान श्रीगणेश के नाम का प्रस्ताव रखा। इस पर उनके द्वारा यह शर्त रखी गई कि वे कथा तब लिखेंगे, जब लेखन के समय उनकी लेखनी को विराम न करना प़डे। इससे पूर्व समस्त आर्ष-साहित्य परम्परागत पद्धति से कंठस्थ किया जाता था परन्तु "जय संहिता" जो "महाभारत" कहलाई, प्रथम लिपिबद्ध कथा है अत: स्पष्ट है कि आर्ष साहित्य में लेखन की परम्परा के प्रारम्भकर्ता पार्वती पुत्र ही हैं। भाद्रपद मास के, शुक्ल पक्ष के, चंद्रमा के दर्शन करने वाले पर चोरी का कलंक लगता है। श्रीकृष्ण भी इससे प्रभावित हुए, ऎसा लोकमत मे प्रचलित है परन्तु यदि त्रुटिवश ऎसा हो जाए तो उसका निदान भी विƒनेश्वर के पास है। कहते हैं कि श्रीगणेश का बारह नामों से पूजन करने से इस कलंक से रक्षा हो जाती है। मैं यह भी बता दूं कि यह स्वत: अनुभूत अनुभव भी है। जिस देवता के नाम से पूजन करने मात्र से ऎसे कलंक से रक्षा हो जाती है, जिससे स्वयं पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण भी नहीं बच सके, उसकी महत्ता, अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है। किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि बुध अथवा राहु की दशा/अन्तर्दशा से पी़डा हो तो श्रीगणेशजी का पूजन उसके निदान हेतु बताया जाता है। "ú गं गणपतये नम:" के जाप के साथ 108दूर्वा तृण उनके चरणों में अर्पित करने से बुध और राहु की दशा/अन्तर्दशा की पी़डा से शांति मिलती है। ये दोनों ही ग्रह व्यक्ति की कुंडली में यदि दुर्बल स्थिति में हों तो घोर मानसिक पी़डा देते हैं तथा बाधाएं उत्पन्न करते हैं। राहु की दशा प्राय: व्यक्ति को घोर विभ्रम की अवस्था में डाल देती है। बुध की दशा/अन्तर्दशा में विशेष रूप से यदि गुरू से संबंधित हो तो "लेखनी की त्रुटि" के कारण मानसिक परेशानियां आती हैं। ऎसे में पुन: श्रीगणेशजी की पूजा ही मानसिक कष्टों और बाधाओं से मुक्ति तथा शांति दिलाती है। भारतीय धार्मिक साहित्य में जहां गणेशजी को कार्य के शुभारम्भ तथा बाधाओं के प्रशमन का गुरूतर भार सौंपा गया है, वहीं उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह है कि उनके संबंध मे बाल-सुलभ चंचलता, अत्यधिक भोजन तथा अन्य देवी-देवताओं के लिए समस्या पैदा करने वाली अनेक कथाएं मिलती हैं। उत्तर भारत में "करवा-चौथ" पर गणेश पूजा अखंड सौभाग्य के लिए की जाती है। साथ ही दादी-नानी के मुंह से चुटुक विनायक की कथा भी सुनने को मिलती है, जिसमें विनायक गणेश निर्धन बुढि़या का घर धन सम्पदा से भर देते हैं। घर की ब़डी बूढि़यों के झुर्री भरे चेहरों पर, यह कथा को सुनाते समय जो चमक आती है और इसके अन्त में जो आशीर्वचन- जैसे इसके दिन फिरे- वैसे सबके दिन फिरे- वो देती हैं, उसका आनन्द गूंगे के गु़ड के समान है। पुन: दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश के पूजन से ही पर्व की शुरूआत होती है। व्यापारी वर्ग विशेष रूप से अपने आने वाले वित्तीय वर्ष में समृद्धि की कामना से मां महालक्ष्मी के साथ गंगाजल की पूजा करते हैं। महाराष्ट्र में गणपति पूजन के समय जनमानस का उत्साह देखते ही बनता है। राष्ट्र 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद घोर अवसाद में था, तब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने सन 1892/93 में पहले गणपति पूजन और फिर शिवाजी जयन्ती को सार्वजनिक उत्सव के रूप मनाना आरम्भ किया। श्रीगणेश जनमानस के देवता थे। उनके पूजन के नाम पर जनता में उत्साह जाग्रत हुआ तथा उसे ही तिलकजी ने राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा से जो़ड दिया। ब्रिटिश सरकार की नजरों से बचकर यह जन जागरण का सैलाब श्री गणेश के कारण ही उम़डा और अंतत: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अंग बन गया। आज भी गरीबी, बाढ़, भी़ड, बेरोजगारी आदि समस्याओं के बीच लेजिम और ढोल की थाप पर नाचते हुए मुम्बईकर गणेशमय हो जाते हैं और दस दिन तक सभी लौकिक चिंताओं से दूर हो जाते हैं। यह गणेशजी का ही प्रभाव है कि सम्पूर्ण महाराष्ट्र, विशेष रूप से मुम्बई धर्म सम्प्रदाय, जाति, भाषा और क्षेत्र की विविधताओं से ऊपर उठकर "गणपति बप्पा" के स्वागत सत्कार में लग जाता है। गणपति बप्पा मोरिया- आला अरसी सावडिया के नारों से गणपति की विदाई भी कुछ कम मार्मिक नहीं होती। भूख-प्यास, आधि-व्याधि, गरीबी-परेशानी सब भूलकर लोग दस दिन के लिए श्रीगणपति की आराधना में समाधिस्थ हो जाते हैं। निश्चय ही श्रीगणेश से अधिक लोकमानस को प्रभावित करने वाला कोई देवता नहीं है। मुम्बई में लाल बाग के बादशाह की विशेष महत्ता है। साथ ही सिद्धि विनायक तो विराजमान हैं ही। कभी आप इस बात पर ध्यान दें कि श्री अमरनाथजी की पवित्र गुफा से लेकर रामनरेश महादेव तथा मां कामाख्या देवी से लेकर सोमनाथजी तक प्रत्येक मंदिर में प्रवेश से पूर्व श्री गणेश विराजमान रहते हैं। श्रद्धालु को जब गणेशजी के दर्शन होते हैं तो अपने आराध्य देव के दर्शन की आशा से उसका मन उल्फुल्लित हो जाता है और अपनी सारी थकान भूल जाता है। ऎसी महिमा गजानन की है इसीलिए चाहे मोतीडूंगरी के गणेश हों या मुम्बई के सिद्धि विनायक अथवा देश में स्थापित गणेशजी की अन्य सिद्ध पीठ, सदैव से ही भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने के कारण भक्तजनों की श्रद्धा का केन्द्र बने रहते हैं। मां पार्वती तथा देवाधिदेव महादेव के प्रिय पुत्र श्रीगणेश की कृपा के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता इसीलिए पूजन के अंत मे आशीर्वचन के रूप मे पंडित जी यह मंगल कामना करते हैं कि "यान्तु देवगणा: सर्वे।" अर्थात् सभी देवी देवता, जिन्हें पूजन के लिए आमंत्रित किया गया था, अपने-अपने स्थानों को पधारें तथा मंगल कार्य होने पर उन्हें फिर बुलाया जाएगा परन्तु लक्ष्मी-गणेश एवं ऋद्धि-सिद्धि यहीं विराजमान रहें। स्पष्ट है कि माता लक्ष्मी और श्रीगणेश अपनी सहधर्मिणी ऋद्धि-सिद्धि के साथ जब कृपा करते हैं तभी मानव का लौकिक तथा परलौकिक जीवन सफल हो पाता है। श्रीगणेश की महिमा को लिपिबद्ध करने में मेरी अल्पबुद्धि स्वयं को असमर्थ पाती है अत: इस निवेदन के साथ कि श्रीगणेशजी सभी का कल्याण करें- लेखनी को विराम दे रहा  हू ।
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सोमवार

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था धर्म के विपरीत आचरण करने वाला...

at 16:41
मनोज जैसवाल : भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था धर्म के विपरीत आचरण करने वाला, अन्याय और अधर्म में लिप्त व्यक्ति भले ही निकट संबंधी हो, पर उसे निश्चय ही दंड मिलना चाहिए।
भीम पुत्र घटोत्कच आसुरी प्रवृत्ति का था। इसके बावजूद वह पराक्रमी योद्धा था। उसने पांडवों की ओर से कौरवों से युद्ध किया और उनको नाकों चने चबाए। एक दिन युद्ध में कर्ण ने अजेय अमोघ शक्ति का प्रयोग करके घटोत्कच का वध कर दिया। घटोत्कच जैसे पराक्रमी का वध होते ही पांडव सेना में शोक व्याप्त हो गया। किंतु श्रीकृष्ण वध की सूचना मिलते ही आनंदमग्न हो उठे। श्रीकृष्ण को शोक की जगह आनंद मनाते देख आश्चर्य से अर्जुन ने पूछ लिया, मधुसूदन, आपको शोक की जगह प्रसन्नता क्यों हो रही है? श्रीकृष्ण बोले, धनंजय, इसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि जिस वैजयंती शक्ति के आघात से कर्ण ने घटोत्कच का वध किया है, वह उससे तुम्हारा जीवन भी ले सकता था। अब तुम अबध्य हो गए। दूसरा कारण यह है कि घटोत्कच असुर और धर्मविरोधी था। यदि कर्ण के द्वारा उसका अंत नहीं होता, तो मुझे अपने हाथों उसे एक न एक दिन मारना होता।
भीष्म पितामह ने एक बार श्रीकृष्ण की निष्पक्षता का वर्णन करते हुए युधिष्ठिर से कहा, श्रीकृष्ण का जन्म धर्म की रक्षा के लिए हुआ है। शिशुपाल उनकी बुआ का पुत्र था, किंतु उसके बढ़ते पापाचार को देखकर भगवान ने उसके वध में भी कोई संकोच नहीं किया। ऐसे निष्पक्ष व्यक्ति पर पांडवों के साथ पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

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